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विस्तृत उत्तर
जनलोक को हृदय से ऊपर और कंठ के स्थान पर बताया गया है, जिसे योगशास्त्र में विशुद्ध चक्र का स्थान माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि जनलोक विशुद्ध ज्ञान, उच्च कोटि की बौद्धिकता, पूर्ण वैराग्य और सात्त्विक ऊर्जा का केंद्र है। जो आत्माएँ मोह, माया, सांसारिक इच्छाओं और स्वर्ग के भोगों से ऊपर उठकर ज्ञान और वैराग्य के विशुद्ध कंठ-स्तर तक पहुँचती हैं, वे जनलोक की अधिकारी होती हैं।
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