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विस्तृत उत्तर
जनलोक में किसी एक विशिष्ट भौतिक देवता का आधिपत्य उस रूप में नहीं है जैसे स्वर्ग में देवराज इंद्र का होता है। यह आत्म-अनुशासित ऋषियों और मुनियों का स्वायत्त लोक है। फिर भी श्रीमद्भागवत पुराण के एक प्रसंग में वरुण देवता को प्रतीकात्मक रूप से इस लोक के अधिपति या दिशा-रक्षक के रूप में संदर्भित किया गया है, जहाँ जनलोक को वरुण का लोक भी कहा गया है। यहाँ का वास्तविक अधिष्ठाता विशुद्ध ज्ञान और भगवान नारायण की परम सत्ता है।
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