विस्तृत उत्तर
तांत्रिक साधना में गुरु की अनिवार्यता का वर्णन कुलार्णव तंत्र और महानिर्वाण तंत्र में विस्तार से है:
कुलार्णव तंत्र का वचन
> 'गुरुं विना न ज्ञानं, गुरुं विना न मुक्तिः।
> गुरोः कृपाप्रसादेन सर्वसिद्धिः प्रजायते।'
— गुरु के बिना न ज्ञान है, न मुक्ति। गुरु की कृपा से ही सर्व सिद्धि होती है।
गुरु की भूमिका
1सही मंत्र दीक्षा
तंत्र में मंत्र केवल लिखित रूप में नहीं — गुरु के मुख से सुनकर ग्रहण किए जाते हैं। गुरु के मुख से निकला मंत्र 'चैतन्य' (जीवित) होता है। पुस्तक से लिया मंत्र 'जड' (निष्प्राण) हो सकता है।
2शक्तिपात
कुलार्णव तंत्र में शक्तिपात का वर्णन है — गुरु अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा शिष्य में संक्रमित करते हैं। यह परंपरा-श्रृंखला (गुरु-परंपरा) के माध्यम से देवी की शक्ति प्रवाहित होती है।
3संरक्षण
काली साधना में यदि साधक कोई गलती करे — उग्र अनुभव हो, मन अस्थिर हो — तो गुरु संरक्षण देते हैं। बिना गुरु के ऐसी स्थिति में साधक को मार्गदर्शन नहीं मिलता।
4सही क्रम
काली साधना के विभिन्न स्तर हैं — कौन सी साधना, किस क्रम में करनी है — यह गुरु ही बता सकते हैं।
भक्ति मार्ग में गुरु
शुद्ध भक्ति मार्ग में (नित्य पूजा, मंत्र जप) गुरु आवश्यक नहीं — देवी स्वयं गुरु हैं। किंतु तांत्रिक विधि के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।
महानिर्वाण तंत्र
बिना दीक्षायाः साधनं निष्फलं भवति निश्चितम्।' — दीक्षा के बिना साधना निश्चित रूप से निष्फल होती है।





