विस्तृत उत्तर
जप में गुरु की भूमिका का वर्णन कुलार्णव तंत्र और गुरु गीता में विस्तार से है:
कुलार्णव तंत्र
गुरुकृपा बिना ज्ञानं न जायते।' — गुरु की कृपा के बिना ज्ञान (और मंत्र सिद्धि) नहीं मिलती।
गुरु के पाँच कार्य
1मंत्र चयन
गुरु शिष्य के स्वभाव, जन्म कुंडली और साधना स्तर के अनुसार उचित मंत्र देते हैं।
2शक्तिपात
गुरु दीक्षा में 'शक्तिपात' — गुरु अपनी साधना की संचित ऊर्जा शिष्य को हस्तांतरित करते हैं। यह मंत्र को 'जीवित' करता है।
3सही विधि
उच्चारण, संख्या, नियम — सही विधि गुरु ही बता सकते हैं।
4बाधाओं में मार्गदर्शन
साधना में आने वाले भय, विक्षेप, अनुभव — गुरु समझाते हैं।
5प्रेरणा
गुरु स्वयं उस मार्ग से चले हुए हैं — उनकी उपस्थिति मात्र प्रेरणा देती है।
यदि देह में गुरु न मिलें
- ▸भागवत पुराण: ग्रंथ (शास्त्र) गुरु हो सकते हैं
- ▸'भगवान को गुरु मानकर' जप करें
- ▸किसी श्रद्धेय संत को मन में गुरु मानें
गुरु गीता
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।' — गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं।





