विस्तृत उत्तर
कुश (Eragrostis cynosuroides — एक विशेष घास) का आसन सनातन धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में सर्वाधिक पवित्र और मंत्र-सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
कुश का नाम और अर्थ: 'कु' शब्द समस्त पापों का वाचक है और 'श' शब्द सभी दोषों-पापों का नाशक है। इसलिए शीघ्र पाप-नाश करने के कारण इसे 'कुश' कहा गया है।
शास्त्रीय महत्व: कुश की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु और शीर्ष भाग में भगवान शिव विराजते हैं। इसलिए कुश-आसन पर बैठना त्रिमूर्ति के संसर्ग में बैठने के समान है। मनुस्मृति, गरुड़ पुराण और वायु पुराण में श्राद्ध, तर्पण, जप और हवन में कुश का उपयोग अनिवार्य बताया गया है।
वैज्ञानिक कारण: कुश विद्युत का कुचालक है। इसके आसन पर बैठकर पूजा-जप करने से शरीर की आध्यात्मिक शक्ति पार्थिव विद्युत के प्रवाह से क्षीण नहीं होती। परिणामस्वरूप कामनाओं की शीघ्र पूर्ति होती है और मंत्र-सिद्धि होती है।
फल: कुश-आसन पर बैठकर साधना करने से शुचिता, तन्मयता, स्वास्थ्य, यश, वैभव और एकाग्रता में वृद्धि होती है। 'कुश आसन पर बैठकर मंत्र जप करने से अनंत गुना फल प्राप्त होता है।' — TV9 verified।


