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विस्तृत उत्तर
तपोलोक के वैराज देवगणों को रोग का लौकिक भय नहीं सताता। शिव पुराण के अनुसार उनका कोई स्थूल शरीर नहीं होता और वे अमूर्त या अशरीरी होते हैं। वे चेतनामय प्रकाश-स्वरूप और ज्ञान-स्वरूप हैं। चूँकि उनका शरीर पाञ्चभौतिक नहीं है, इसलिए उन्हें बुढ़ापा, रोग, थकान, शोक या मृत्यु का भय नहीं होता। वे निरंतर परमानंद और ब्रह्मानंद का रसपान करते हुए अपने आत्म-स्वरूप में स्थित रहते हैं।
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