विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण में महर्लोक को विराट् पुरुष की ग्रीवा (गर्दन) कहने का गूढ़ और रहस्यमयी अर्थ है। जिस प्रकार मानव शरीर में गर्दन (ग्रीवा) धड़ (निचले भौतिक अंगों) और सिर (उच्चतम वैचारिक और चेतनात्मक अंगों) को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण सेतु है ठीक उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में महर्लोक विनाशशील त्रैलोक्य (स्वर्ग तक के सकाम कर्मों वाले लोक) और नित्य-अविनाशी लोकों (जनलोक से सत्यलोक तक के मोक्ष-गामी लोक) के बीच एक सशक्त आध्यात्मिक सेतु का कार्य करता है। गर्दन के बिना सिर और धड़ नहीं जुड़ सकते उसी प्रकार महर्लोक के बिना भौतिक लोकों से आध्यात्मिक लोकों की ओर जाने का सीधा मार्ग नहीं है।
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