विस्तृत उत्तर
महर्लोक का स्वरूप और वातावरण स्वर्गलोक से नितांत भिन्न और श्रेष्ठ है। यह लोक पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्त्व गुण से आच्छादित है जहाँ रजोगुण (लोभ और गति) तथा तमोगुण (अज्ञान और निद्रा) का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है। यहाँ भौतिक जगत के किसी भी विकार जैसे रोग, शोक, वृद्धावस्था, थकावट, ईर्ष्या, क्रोध और क्षुधा (भूख) का पूर्णतः अभाव है। यहाँ के निवासी अन्न या जल पर निर्भर नहीं रहते बल्कि वे योग-अग्नि और परब्रह्म के ध्यान से ही पोषण प्राप्त करते हैं। महर्लोक कोई भौतिक भोग-भूमि नहीं है अपितु यह एक विशुद्ध आध्यात्मिक, चेतनात्मक और तपोमयी ऊर्जा का लोक है। यहाँ का वातावरण तपस्या, प्रगाढ़ वैराग्य और यज्ञीय ऊर्जा से निरंतर स्पंदित रहता है।
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