विस्तृत उत्तर
महातल लोक हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण अधोलोक है। यह पृथ्वी से 50,000 योजन नीचे सात पातालों में पांचवें स्तर पर स्थित है। यह नरक नहीं, बल्कि बिल-स्वर्ग है, जहाँ स्वर्ग से भी अधिक भौतिक सुख, संपदा, विलासिता और ऐश्वर्य उपलब्ध है। इसका मुख्य निवास कद्रू के वंशज बहु-फनों वाले काद्रवेय नाग हैं, जिनमें तक्षक, कालिय, कुहक और सुषेण प्रमुख हैं। महातल नागमणियों के प्रकाश से प्रकाशित, मणि-जटित महलों, स्वर्ण-रत्नों के भवनों, निर्मल सरोवरों, कमलों की सुगंध और कोकिलों के मधुर कलरव से युक्त है। यह भगवान के विराट रूप में टखनों का प्रतिनिधित्व करता है। सगर पुत्रों और कपिल मुनि की कथा, गंगा का महातल तक अवतरण, तक्षक और कालिय के प्रसंग, गरुड़ का भय, तथा कर्म सिद्धांत इसे पौराणिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। इसका मूल संदेश यह है कि भौतिक ऐश्वर्य बहुत हो सकता है, पर ईश्वरीय शरणागति के बिना भय और जन्म-मृत्यु का बंधन बना रहता है।
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