विस्तृत उत्तर
हेमाद्रि' और 'माधव' के विवेचन के अनुसार, मकर और कर्क संक्रांति को छोड़कर अन्य संक्रांतियों का पुण्यकाल रात्रि में होने पर अगले दिन स्थानांतरित हो जाता है।
परंतु मकर संक्रांति (उत्तरायण) और कर्क संक्रांति (दक्षिणायन) के विशेष माहात्म्य के कारण इनका पुण्यकाल रात्रि में होने पर भी दिन भर मान्य रहता है।
इनके विशेष माहात्म्य का कारण यह है कि ये दोनों संक्रांतियाँ क्रमशः उत्तरायण (देवयान) और दक्षिणायन (पितृयान) के प्रारंभ को चिह्नित करती हैं, जो ब्रह्मांडीय दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण खगोलीय परिवर्तन हैं।
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