विस्तृत उत्तर
मंत्र जप के अर्थ का वर्णन पाणिनि के व्याकरण और मंत्र महोदधि में मिलता है:
'मंत्र' की व्याकरणिक व्युत्पत्ति
- ▸'मन्' (धातु) = मनन करना, चिंतन करना
- ▸'त्र' (प्रत्यय) = त्राण — रक्षा
- ▸अर्थ: 'जो मनन करने पर रक्षा करे'
'जप' की व्युत्पत्ति
- ▸'जप्' (धातु) = धीरे-धीरे बोलना, मन में दोहराना
- ▸जप = मंत्र की आवृत्ति
मंत्र जप का गहरा अर्थ
1देवता का स्मरण
हर मंत्र = एक देवता का नाम या गुणगान। जप = देवता का निरंतर स्मरण।
2ध्वनि-अर्थ एकता
तंत्र शास्त्र: संस्कृत में शब्द और उसका अर्थ — दोनों एक ही ध्वनि से जुड़े हैं। 'अग्नि' बोलने से गर्मी का अनुभव — यह अकारण नहीं।
3निरंतर स्मरण
जप = अनवरत स्मरण। भागवत: 'स्मरणं' नवधा भक्ति का तृतीय अंग।
4मन का परिष्कार
जप = मन को बार-बार भगवान की ओर मोड़ना। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है।
जप का परम अर्थ
अजपा जप' — 'हंसः' — श्वास-प्रश्वास में स्वतः होने वाला जप: 'हं' = श्वास लेना, 'सः' = श्वास छोड़ना। 24 घंटे में 21,600 बार — यही परम जप।





