विस्तृत उत्तर
मंत्र जप की परिभाषा और महत्व भगवद् गीता, मनुस्मृति और मंत्र शास्त्र में विस्तार से वर्णित है:
'मंत्र' का अर्थ
मनन त्रायते इति मंत्रः' — जो मनन (चिंतन) करने पर रक्षा करे, वह मंत्र है। मंत्र शास्त्र की व्युत्पत्ति:
- ▸मन् = मनन/ध्यान
- ▸त्र = त्राण (रक्षा)
'जप' का अर्थ
जपो नाम मनसा वाचा देवताध्यानपूर्वकम्।' — देवता का ध्यान करते हुए मन या वाणी से मंत्र की आवृत्ति करना जप है।
भगवद् गीता (10.25)
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं — 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि' — यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ। जप भगवान का स्वयं का स्वरूप है।
मनुस्मृति
जपो यज्ञः श्रेष्ठतमः' — यज्ञों में जपयज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।
जप के तीन प्रकार
- 1वाचिक जप — मुख से स्पष्ट उच्चारण (प्रारंभिक साधक)
- 2उपांशु जप — होंठ हिलाएं, आवाज न निकले (मध्यम)
- 3मानस जप — मन में, बिना किसी शारीरिक क्रिया (सर्वश्रेष्ठ)
मनुस्मृति
वाचिकाद् दशगुणं श्रेष्ठमुपांशु स्यात् प्रकीर्तितम्। उपांशोश्च शतगुणं मानसं जपमुत्तमम्।
— वाचिक से 10 गुणा उपांशु और उपांशु से 100 गुणा मानस जप श्रेष्ठ है।
सारांश
जप = देवता का ध्यान + मंत्र की आवृत्ति + श्रद्धा — यह तीनों मिलकर जप बनाते हैं।





