विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद आत्मा तब प्रेत बनती है जब वह ऊर्ध्व गति, पितृलोक या नई स्थूल योनि प्राप्त नहीं कर पाती। ऐसा विशेष रूप से तब होता है जब मृत्यु के बाद अंत्येष्टि, दशगात्र, षोडश श्राद्ध और पिण्डदान जैसे ऊर्ध्वदैहिक संस्कार विधिपूर्वक नहीं किए जाते। गरुड़ पुराण कहता है कि पिण्डदान से वंचित जीव प्रेत रूप होकर निर्जन वनों में कल्प के अंत तक दुखी होकर भटकते हैं। अकाल मृत्यु में भी जीवात्मा की संसार से विरक्ति नहीं हुई होती और उसकी आयु शेष होती है, इसलिए वह अपनी शेष आयु पूर्ण होने तक प्रेत रूप में भटकती है। घोर पाप कर्म करने वाले जीव नरक यातना के बाद भी प्रेत योनि में आते हैं।
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