विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के अनुसार, भौतिक देह त्याग के बाद जब तक जीव का सपिण्डीकरण संस्कार पूर्ण नहीं होता, तब तक वह सूक्ष्म और वायवीय शरीर में प्रेत योनि में रहता है। गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड में वर्णित है कि सपिण्डीकरण के दिन प्रेत शरीर को पितृलोक में आधिकारिक स्थान प्राप्त होता है और वह प्रेत की निम्न अवस्था से मुक्त होकर पितृ की श्रेणी में पदोन्नत हो जाता है। इस संस्कार में प्रेत के पिण्ड को पितरों के पिण्डों के साथ मिलाया जाता है, जिससे वह पितृ मण्डल में सम्मिलित होकर वसु स्वरूप प्रथम पीढ़ी का पितृ बनता है।
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