विस्तृत उत्तर
महापुराणों में प्रलय को मुख्यतः चार भागों में विभक्त किया गया है — नित्य प्रलय (प्रतिदिन जीवों की मृत्यु), नैमित्तिक प्रलय (ब्रह्मा की रात्रि), प्राकृतिक प्रलय (ब्रह्मा की मृत्यु या महाप्रलय), और आत्यन्तिक प्रलय (मोक्ष की प्राप्ति)। नैमित्तिक प्रलय तब घटित होता है जब एक पूर्ण कल्प (4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष या एक सहस्र चतुर्युगी) के पश्चात् ब्रह्मा जी का एक दिन समाप्त होता है और उनकी विश्राम की रात्रि आरम्भ होती है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार इस नैमित्तिक प्रलय में ब्रह्माण्ड के सभी चौदह लोक नष्ट नहीं होते अपितु केवल नीचे के तीन लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक, और स्वर्लोक) ही पूरी तरह से भस्म और जलमग्न होते हैं। इस प्रलय की प्रक्रिया में सर्वप्रथम सौ वर्षों तक भयंकर अनावृष्टि होती है और तत्पश्चात सात प्रचंड सूर्य त्रैलोक्य को जलाते हैं।
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