विस्तृत उत्तर
पीपल (अश्वत्थ) का वृक्ष हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र वृक्षों में गिना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (10.26) में कहा — 'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' अर्थात वृक्षों में मैं पीपल हूँ।
पीपल में देवता वास
मान्यता है कि पीपल की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है — इसलिए पीपल को 'त्रिमूर्ति वृक्ष' भी कहा जाता है।
पीपल पूजा की विधि
- 1शुभ दिन: शनिवार को पीपल पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके अतिरिक्त अमावस्या, सोमवार और पूर्णिमा भी शुभ हैं। (नोट: बुधवार और रविवार को पीपल में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।)
- 1प्रातःकाल: स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पीपल के पास जाएँ।
- 1जल अर्पण: पीपल की जड़ में शुद्ध जल (गंगाजल उत्तम) अर्पित करें।
- 1तिलक और अक्षत: जड़ पर रोली/कुमकुम का तिलक लगाएँ, अक्षत (चावल) चढ़ाएँ।
- 1कलावा (मौली) बाँधें: पीपल के तने पर कच्चा धागा (कलावा) बाँधें।
- 1धूप-दीपक: सरसों तेल का दीपक जलाएँ (विशेषतः शनिवार को)। अगरबत्ती या धूप लगाएँ।
- 1परिक्रमा: पीपल की कम से कम 7 परिक्रमा करें (शनि शांति हेतु)। कुछ परम्पराओं में 108 परिक्रमा का विधान है।
- 1मंत्र: परिक्रमा करते हुए यह मंत्र बोलें — 'मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णुः शाखा शंकरमेव च। पत्रे-पत्रे सर्वदेवानां वृक्षराज नमोऽस्तु ते।'
- 1प्रणाम: पूजा के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
विशेष पूजा — शनिवार
- ▸शनि दोष, साढ़ेसाती आदि शांति हेतु शनिवार को पीपल में सरसों तेल का दीपक जलाएँ।
- ▸काले तिल, जल, और सरसों तेल पीपल की जड़ में अर्पित करें।
निषेध
- ▸पीपल का वृक्ष कभी न काटें — यह महापाप माना गया है।
- ▸बुधवार और रविवार को पीपल में जल न दें।
- ▸रात्रि में पीपल की पूजा न करें।
फल: पीपल पूजा से शनि दोष निवारण, पितृ दोष शांति, संतान प्राप्ति, रोग निवारण, और मोक्ष की प्राप्ति होती है — ऐसी शास्त्रीय मान्यता है।





