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पूजा विधि📜 स्कन्द पुराण, पद्म पुराण, भगवद्गीता (अध्याय 10), अथर्ववेद3 मिनट पठन

पीपल के पेड़ की पूजा कैसे करें?

संक्षिप्त उत्तर

पीपल पूजा: शनिवार सर्वोत्तम। विधि: स्नान → जड़ में जल → रोली-अक्षत → कलावा बाँधें → सरसों तेल दीपक → 7+ परिक्रमा → 'मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णुः...' मंत्र → प्रणाम। त्रिमूर्ति वास (जड़-ब्रह्मा, तना-विष्णु, शाखा-शिव)। बुधवार-रविवार जल वर्जित। कभी न काटें।

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विस्तृत उत्तर

पीपल (अश्वत्थ) का वृक्ष हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र वृक्षों में गिना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (10.26) में कहा — 'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' अर्थात वृक्षों में मैं पीपल हूँ।

पीपल में देवता वास

मान्यता है कि पीपल की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है — इसलिए पीपल को 'त्रिमूर्ति वृक्ष' भी कहा जाता है।

पीपल पूजा की विधि

  1. 1शुभ दिन: शनिवार को पीपल पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके अतिरिक्त अमावस्या, सोमवार और पूर्णिमा भी शुभ हैं। (नोट: बुधवार और रविवार को पीपल में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।)
  1. 1प्रातःकाल: स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पीपल के पास जाएँ।
  1. 1जल अर्पण: पीपल की जड़ में शुद्ध जल (गंगाजल उत्तम) अर्पित करें।
  1. 1तिलक और अक्षत: जड़ पर रोली/कुमकुम का तिलक लगाएँ, अक्षत (चावल) चढ़ाएँ।
  1. 1कलावा (मौली) बाँधें: पीपल के तने पर कच्चा धागा (कलावा) बाँधें।
  1. 1धूप-दीपक: सरसों तेल का दीपक जलाएँ (विशेषतः शनिवार को)। अगरबत्ती या धूप लगाएँ।
  1. 1परिक्रमा: पीपल की कम से कम 7 परिक्रमा करें (शनि शांति हेतु)। कुछ परम्पराओं में 108 परिक्रमा का विधान है।
  1. 1मंत्र: परिक्रमा करते हुए यह मंत्र बोलें — 'मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णुः शाखा शंकरमेव च। पत्रे-पत्रे सर्वदेवानां वृक्षराज नमोऽस्तु ते।'
  1. 1प्रणाम: पूजा के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें।

विशेष पूजा — शनिवार

  • शनि दोष, साढ़ेसाती आदि शांति हेतु शनिवार को पीपल में सरसों तेल का दीपक जलाएँ।
  • काले तिल, जल, और सरसों तेल पीपल की जड़ में अर्पित करें।

निषेध

  • पीपल का वृक्ष कभी न काटें — यह महापाप माना गया है।
  • बुधवार और रविवार को पीपल में जल न दें।
  • रात्रि में पीपल की पूजा न करें।

फल: पीपल पूजा से शनि दोष निवारण, पितृ दोष शांति, संतान प्राप्ति, रोग निवारण, और मोक्ष की प्राप्ति होती है — ऐसी शास्त्रीय मान्यता है।

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शास्त्रीय स्रोत
स्कन्द पुराण, पद्म पुराण, भगवद्गीता (अध्याय 10), अथर्ववेद
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