विस्तृत उत्तर
पितामह, अर्थात दादा, को रुद्र स्वरूप माना जाता है क्योंकि पितृ वर्गीकरण में द्वितीय पीढ़ी को रुद्र अवस्था से जोड़ा गया है। मनुस्मृति में कहा गया है कि पितामहों को रुद्र कहा गया है और यह सनातन श्रुति है। रुद्र प्राण-तत्त्व, शुद्धि और सूक्ष्म प्राणिक अवस्था के प्रतीक हैं। पिता वसु रूप में स्थूल और निकट भौतिक संबंध का प्रतीक है, जबकि पितामह उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ जीवात्मा स्थूलता से ऊपर उठकर सूक्ष्म प्राणिक स्तर में प्रवेश करती है। इसलिए दादा को रुद्र स्वरूप माना जाता है।
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