विस्तृत उत्तर
पितृ तत्त्व सनातन धर्मशास्त्रों में पूर्वजों की उस सूक्ष्म और पारलौकिक अवस्था को कहा गया है जिसमें मृत जीवात्मा केवल एक मृत पारिवारिक सदस्य नहीं रहती, बल्कि श्राद्ध, तर्पण और सपिण्डीकरण के बाद पितृ श्रेणी में प्रतिष्ठित होती है। मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि जीव की एक लोक से दूसरे लोक की सूक्ष्म यात्रा माना गया है। इस यात्रा में जीव को अपने सञ्चित और क्रियमाण कर्मों के साथ-साथ वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध-कर्मों और तर्पण के आधार पर विशिष्ट लोकों एवं योनियों की प्राप्ति होती है। पितृ रूप में परिणत होने पर शास्त्र पितरों को सामान्य जीवात्मा नहीं मानते, बल्कि उन्हें वसु, रुद्र और आदित्य जैसे ब्रह्माण्डीय देव वर्गों के साथ एकाकार मानते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





