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विस्तृत उत्तर
पितृ तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है क्योंकि पितरों का लोक और यमराज का निवास दक्षिण दिशा में माना गया है। देव-कृत्य पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर किए जाते हैं, परंतु पितृ-कृत्य दक्षिणाभिमुख होकर या दक्षिण-पश्चिम दिशा में समाप्त किए जाते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पिण्डदान करने से तर्पण की ऊर्जा सीधे पितृलोक तक पहुँचती मानी जाती है।
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