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पूजा विधि📜 ऋग्वेद, गृह्यसूत्र, पूजा पद्धति2 मिनट पठन

पूजा घर में पानी का कलश रखने का विधान क्या है

संक्षिप्त उत्तर

तांबे के कलश में शुद्ध जल (गंगाजल सहित), स्वस्तिक, मोली, आम के पत्ते और नारियल रखें। ईशान कोण या मूर्तियों के दाहिनी ओर स्थापित करें। नित्य जल बदलें। कलश पूर्णता और मंगल का वैदिक प्रतीक है।

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विस्तृत उत्तर

कलश वैदिक परंपरा में अत्यंत पवित्र प्रतीक है। ऋग्वेद में कलश को 'पूर्ण कुंभ' (भरा हुआ घड़ा) कहा गया है जो पूर्णता, समृद्धि और मंगल का प्रतीक है।

कलश रखने का विधान

  1. 1पात्र — तांबे का कलश सर्वोत्तम। पीतल भी स्वीकार्य। प्लास्टिक या कांच वर्जित।
  1. 1जल — स्वच्छ शुद्ध जल भरें। गंगाजल मिलाना अत्यंत शुभ।
  1. 1कलश सजावट:
  • कलश पर स्वस्तिक बनाएं (कुमकुम/हल्दी से)।
  • कलश के मुख पर 5 या 7 आम के पत्ते रखें।
  • ऊपर नारियल (शिखा ऊपर की ओर) रखें।
  • कलश के गले में मोली (लाल धागा) बांधें।
  • कलश में सुपारी, सिक्का, दूर्वा या अक्षत डालें।
  1. 1स्थान — पूजा स्थल में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में या मूर्तियों के दाहिनी ओर।
  1. 1आधार — कलश को चावल या अक्षत से भरी थाली/चौकी पर रखें।

कब रखें

  • नवरात्रि — 9 दिन कलश स्थापना।
  • सत्यनारायण कथा — कलश पूजन अनिवार्य।
  • विशेष अनुष्ठान/हवन में।
  • नित्य पूजा में भी जल कलश रखना शुभ है।

कलश में जल बदलना

  • नित्य कलश का जल प्रतिदिन बदलें।
  • विशेष अनुष्ठान का कलश अनुष्ठान अवधि तक रखें, फिर जल तुलसी के पौधे में या बहते जल में विसर्जित करें।

कलश का प्रतीकार्थ

  • जल — जीवन, पवित्रता
  • आम के पत्ते — पंचतत्व/पंच प्राण
  • नारियल — ईश्वर (तीन आंखें = त्रिदेव)
  • कलश — शरीर/ब्रह्मांड
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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद, गृह्यसूत्र, पूजा पद्धति
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