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विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण सारोद्धार में स्पष्ट कहा गया है कि जो लोग पिण्डदान से वंचित रह जाते हैं, वे प्रेत रूप हो जाते हैं और कल्प के अंत तक निर्जन वनों में अत्यधिक दुखी होकर भटकते रहते हैं। इसका कारण यह है कि पिण्डदान, श्राद्ध और सपिण्डीकरण जैसे ऊर्ध्वदैहिक संस्कार जीवात्मा को आगे की गति देने के लिए आवश्यक माने गए हैं। इनके अभाव में आत्मा वायव्य सूक्ष्म शरीर में ही आबद्ध रह जाती है, भूख-प्यास से पीड़ित होती है और पितृलोक या नई स्थूल योनि प्राप्त नहीं कर पाती।
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