विस्तृत उत्तर
महाराज प्रियव्रत ने सूर्य के रथ का अनुसरण करते हुए अपने तेजोमय रथ पर सवार होकर पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की। उनके इस अलौकिक रथ के पहियों के प्रगाढ़ और भारी दबाव से पृथ्वी पर जो सात गहरी वलयाकार खाइयाँ बनीं वे ही कालांतर में सात महासागरों में परिवर्तित हो गईं। इन सात गोलाकार खाइयों में महासागरों का जल भर गया और उन महासागरों के मध्य बचे हुए वृत्ताकार भू-भाग सप्त-द्वीप कहलाए। यह एक अत्यंत रोचक, वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण आख्यान है जो ब्रह्माण्डीय काल-गणना और भू-आकृति विज्ञान का अद्भुत समन्वय है। इस प्रकार सप्तद्वीपों की उत्पत्ति का मूल कारण महाराज प्रियव्रत की रात्रि का अंधकार मिटाने की अलौकिक और पराक्रमी चेष्टा थी।
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