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उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा: मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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उत्पन्ना एकादशी व्रत-कथा: पद्म पुराण अंतर्गत युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद का अक्षुण्ण एवं पारंपरिक पाठ

पारंपरिक प्रारंभ: नैमिषारण्य में सूत-शौनक संवाद

परम पावन और तपोमय नैमिषारण्य तीर्थ में, जहाँ अठासी हजार ऋषि-मुनि भगवद्-चर्चा और पुराण-श्रवण हेतु एकत्र थे, वहाँ परम ज्ञानी सूत जी महाराज विराजमान थे । ऋषियों की उस विशाल और पावन सभा को संबोधित करते हुए सूत जी महाराज ने एकादशी व्रतों के परम माहात्म्य को व्यक्त करना आरंभ किया।

सूत जी महाराज ने कहा— "हे शौनक आदि तपोधन ऋषियों! आप सभी ने संपूर्ण लोकों के कल्याण और जीव-मात्र के उद्धार हेतु अत्यंत उत्तम और धर्मयुक्त प्रश्न किया है। एकादशी का व्रत समस्त व्रतों में शिरोमणि, पापों का समूल नाश करने वाला तथा भगवान श्रीहरि विष्णु को अत्यंत प्रिय है। हे मुनीश्वरों! द्वापर युग में जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कमलनयन श्रीकृष्ण से एकादशी की उत्पत्ति और उसके माहात्म्य के विषय में प्रश्न किया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने जो अत्यंत रहस्यमयी, परम पवित्र और पाप-नाशिनी कथा उन्हें सुनाई थी, वही पुरातन और अक्षुण्ण कथा मैं आज आप सभी के सम्मुख ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप सभी एकाग्रचित्त होकर इस परम कल्याणकारी वृत्तांत का श्रवण करें" ।

युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न

एक समय की बात है, धर्मराज युधिष्ठिर ने परमपिता, चराचर जगत के स्वामी, भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अत्यंत विनयपूर्वक प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए पूछा ।

धर्मराज युधिष्ठिर बोले— "हे देवदेवेश्वर! हे जगन्नाथ! हे माधव! हे कमलनयन! आप संपूर्ण जगत के रक्षक और समस्त धर्मों के ज्ञाता हैं। कृपा करके मेरे मन के इस संशय का निवारण करें। हे देव! यह पुण्यमयी 'एकादशी' तिथि सर्वप्रथम कैसे उत्पन्न हुई? यह पावन तिथि इस विश्व में इतनी पवित्र कैसे हुई? यह समस्त देवताओं को तथा विशेषकर आपको इतनी प्रिय कैसे है? हे केशव! मार्गशीर्ष मास (अगहन) के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसकी उत्पत्ति की कथा क्या है और संसार में उस तिथि को 'उत्पन्ना एकादशी' के नाम से क्यों जाना जाता है? हे त्रिलोकीनाथ! मैं इस एकादशी के प्राकट्य की संपूर्ण कथा और इसके व्रत का माहात्म्य आपके श्रीमुख से सविस्तार सुनने की अभिलाषा रखता हूँ। मुझ पर कृपा करें और इसका पूर्ण वर्णन करें" ।

श्रीकृष्ण द्वारा उत्पन्ना एकादशी का माहात्म्य-वर्णन एवं पारंपरिक आरंभ

धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त और लोकमंगलकारी वचनों को सुनकर परम कृपालु भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए。

भगवान श्रीकृष्ण ने मुसकुराते हुए कहा— "हे कुंतीनंदन! हे धर्मराज! तुमने संपूर्ण लोकों के कल्याण, प्राणियों के उद्धार और विश्व के हित के लिए अत्यंत ही उत्तम प्रश्न किया है । एकादशी के विषय में जानना साक्षात् मेरे ही स्वरूप को जानने के समान है। हे राजन्! बड़े-बड़े यज्ञों, कठिन तपस्याओं और विपुल दान-दक्षिणा से भी मुझे उतना संतोष और प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती, जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान और एकादशी की कथा के श्रवण से होती है ।

हे नृपश्रेष्ठ! इस एकादशी की उत्पत्ति की जो अत्यंत अद्भुत और कल्याणकारी कथा स्वयं ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को सुनाई थी, वही अत्यंत प्राचीन, पाप-हारिणी और मोक्षदायिनी कथा मैं आज तुम्हें सुनाता हूँ। तुम एकाग्रचित्त और श्रद्धावान होकर इस वृत्तांत का श्रवण करो" ।


मुख्य कथा: सतयुग का वर्णन एवं मुर नामक असुर का उत्पात

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— "हे धर्मराज युधिष्ठिर! बहुत प्राचीन काल की बात है। कृतयुग (सत्ययुग) का समय चल रहा था। उस काल में ब्रह्माजी के वंश में तालजंघ (कुछ कल्पों में नाड़ीजंघ) नामक एक अत्यंत भयंकर, महाबलशाली और क्रूर असुर उत्पन्न हुआ था ।

उस तालजंघ नामक महाअसुर का एक पुत्र था, जिसका नाम 'मुर' था । हे राजन्! वह मुर नामक दानव अत्यंत पराक्रमी, महाबलशाली, रौद्र रूप वाला तथा संपूर्ण देवताओं के लिए महाभयंकर था। उसने अपने कठोर तप और बाहुबल से अपार शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। उस दानव ने अपने निवास के लिए 'चन्द्रावती' नाम की एक अत्यंत विशाल और अभेद्य नगरी का निर्माण किया था और वहीं अपनी राजधानी स्थापित करके वह तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगा था ।

मुर दानव इतना महाअहंकारी और बल से उन्मत्त था कि उसने अपने अपार बल के दर्प में चूर होकर देवराज इंद्र पर भारी सेना के साथ आक्रमण कर दिया। उस दुरात्मा महाअसुर ने स्वर्ग के समस्त देवताओं को भीषण युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया। उसने स्वर्ग की सुधर्मा सभा और देवताओं के समस्त आनंद-वनों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसने देवराज इंद्र का राजसिंहासन छीन लिया और देवताओं को स्वर्ग लोक से बलपूर्वक बाहर निकाल दिया ।

इतना ही नहीं, उस महापापी दानव मुर ने स्वर्ग के संपूर्ण व्यवस्थापन को ही भंग कर दिया। उसने अग्निदेव, यमराज, वरुणदेव, वायुदेव, सूर्यदेव और चंद्रदेव के पवित्र एवं अधिकारपूर्ण स्थानों से उन्हें बलपूर्वक हटा दिया और उन सभी देव-स्थानों पर अपने ही चुने हुए असुरों को नियुक्त कर दिया । संपूर्ण देवतागण अपने-अपने अधिकार, पद और वैभव से वंचित होकर, श्रीहीन अवस्था में अत्यंत भयभीत होकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर सामान्य मनुष्यों की भांति छिपकर विचरने लगे" ।

देवताओं का भय और भगवान महादेव की शरण (कैलाश-गमन)

श्रीकृष्ण आगे कहते हैं— "हे धर्मराज! स्वर्ग से निष्कासित, शक्तिहीन और अत्यंत भयभीत हुए संपूर्ण देवतागण देवराज इंद्र के नेतृत्व में परमपिता महादेव (भगवान शिव) की शरण में कैलाश पर्वत पर गए ।

कैलाश पर्वत पर पहुंचकर देवराज इंद्र ने भगवान शंकर के समक्ष नतमस्तक होकर, दोनों हाथ जोड़कर अपनी और समस्त देवताओं की करुण व्यथा प्रस्तुत की। इंद्र ने गदगद कंठ से कहा— 'हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे त्रिपुरारी! मुर नामक उस रौद्र और दुराचारी दानव ने हम समस्त देवताओं को परास्त करके स्वर्ग से निष्कासित कर दिया है। हमारी सारी कांति और शक्ति क्षीण हो गई है। हम मृत्युलोक की पृथ्वी पर दर-दर भटक रहे हैं और हमारी शोभा मनुष्यों के बीच विचरते हुए सर्वथा नष्ट हो गई है। हे त्रिलोकीनाथ! आप हमारी रक्षा करें। उस पापी दानव के अत्याचारों से हम देवगण अत्यंत संतप्त हैं। कृपया इस घोर विपत्ति से उद्धार का कोई मार्ग प्रशस्त करें' ।

देवराज इंद्र और अन्य देवताओं की इस आर्त और करुण पुकार को सुनकर भगवान शिव का हृदय द्रवित हो उठा। भगवान शंकर ने कहा— 'हे देवराज इंद्र! हे देवगण! आप सभी तनिक भी चिंता न करें और इस विपत्ति में तनिक भी विलंब न करते हुए संपूर्ण जगत को शरण देने वाले, शरणागतवत्सल, तीनों लोकों के रक्षक, जगत के स्वामी भगवान गरुड़ध्वज (श्रीहरि विष्णु) की शरण में जाएं। वे इस समय क्षीरसागर में शयन कर रहे हैं। वे श्रीहरि ही भक्तों के दुखों का नाश करने वाले हैं। वे ही आपके समस्त कष्टों का निवारण करेंगे और वे ही उस दुष्ट दानव का संहार करके आपकी रक्षा करेंगे'" ।

क्षीरसागर में देवराज इंद्र द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति

भगवान महादेव के इन कल्याणकारी वचनों को शिरोधार्य कर देवराज इंद्र संपूर्ण देवताओं को अपने साथ लेकर भगवान गदाधर के निवास स्थान, पावन क्षीरसागर पहुंचे । वहां देवताओं ने देखा कि भगवान श्रीहरि अनंत शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम कर रहे हैं。

क्षीरसागर में भगवान विष्णु को योगनिद्रा में लीन देखकर, देवराज इंद्र ने दोनों हाथ जोड़कर, अत्यंत भक्तिभाव से गदगद होकर भगवान की स्तुति आरंभ की ।

इंद्र ने प्रार्थना करते हुए कहा— "हे देवदेवेश्वर! आपको बारंबार नमस्कार है। हे मधुसूदन! हे असुरों के संहारक! हम लोगों की रक्षा कीजिए। हे जगत्पति! हे शरणागतवत्सल! हे संसार के माता-पिता! हे कमलनयन! हम समस्त देवतागण उस महाभयंकर मुर नामक दानव से अत्यंत भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। हे जनार्दन! आप ही इस चराचर जगत के रक्षक हैं, आप ही दुष्टों का संहार करने वाले हैं और आप ही हम देवताओं के एकमात्र आश्रय हैं। हे त्रिलोकीनाथ! उस दैत्य ने हमारा स्वर्ग छीन लिया है, हमें दर-दर का भिकारी बना दिया है। हे नाथ! हमारी रक्षा करें, त्राहिमाम! त्राहिमाम!" ।

देवराज इंद्र की इस आर्त पुकार, स्तुति और देवताओं के हाहाकार को सुनकर भगवान विष्णु की योगनिद्रा तुरंत भंग हो गई। श्रीहरि ने अपने कमल समान नेत्र खोले और देवताओं को अत्यंत भयभीत एवं दीन अवस्था में देखा。

भगवान श्रीहरि ने अत्यंत मधुर परंतु गंभीर वाणी में पूछा— "हे देवराज इंद्र! यह कौन दानव है जिसने तुम देवताओं को इतना भयभीत कर दिया है? वह दानव कैसा है? उसका रूप और बल कैसा है? उसकी उत्पत्ति किससे हुई है तथा उस दुष्ट के रहने का स्थान कहाँ है, जिसके कारण तुम सभी देवता स्वर्ग छोड़कर मेरे पास भाग आए हो?" ।

देवराज इंद्र ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उत्तर दिया— "हे देवदेवेश्वर! ब्रह्माजी के वंश में जो तालजंघ नामक महाअसुर था, यह 'मुर' उसी का महापराक्रमी और रौद्र पुत्र है । वह 'चन्द्रावती' नाम से प्रसिद्ध एक नगरी में अपना स्थान बनाकर निवास करता है । उसी ने अपने अतुलनीय बल और दर्प से हम सबको परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है और हम देवताओं को हमारे स्थानों से वंचित कर दिया है। हे नाथ! उसने स्वर्ग में अपना अलग ही नया इंद्र, नया अग्नि, नया चंद्रमा, नया सूर्य, नया वायु और नया वरुण नियुक्त कर दिया है । उसने यज्ञों के भाग छीन लिए हैं और सर्वत्र अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर दिया है।"

भगवान विष्णु का क्रोध, चन्द्रावती नगरी गमन एवं युद्ध का आरंभ

इंद्र के मुख से मुर दानव के इस महा-उत्पात, दुस्साहस और देवताओं की ऐसी दुर्दशा का वृत्तांत सुनकर भगवान जनार्दन को अत्यंत क्रोध आया । भगवान के नेत्र क्रोध से रक्तिम हो गए। उन्होंने देवताओं को अभयदान देते हुए कहा— "हे देवगण! तुम तनिक भी चिंता न करो। मैं उस दुराचारी दानव और उसकी सेना का अवश्य संहार करूँगा। चलो, उस चन्द्रावती नगरी की ओर प्रस्थान करें।"

यह कहकर भगवान श्रीहरि गरुड़ पर सवार होकर देवताओं को साथ लेकर चंद्रावती नगरी की ओर चल पड़े ।

जब भगवान विष्णु देवताओं के साथ चन्द्रावती नगरी में पहुंचे, तो वहां दानवों की विशाल सेना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध के लिए तत्पर खड़ी थी। दानवों ने जब देखा कि देवता पुनः लौट आए हैं और उनके साथ साक्षात् भगवान श्रीहरि उपस्थित हैं, तो मुर दैत्य का अहंकार और भड़क उठा। वह दानव क्रोध से भर उठा और रणभूमि में आकर बारंबार भीषण गर्जना करने लगा। उसकी भयानक गर्जना और अनगिनत दानवों के भयानक अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार को देखकर देवतागण एक बार पुनः भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए ।

अब वह दुस्साहसी दानव मुर सीधे भगवान विष्णु के सामने आ गया और युद्ध के लिए ललकारने लगा। वह अत्यंत दर्प से भरकर बोला— "खड़ा रह! खड़ा रह!" ।

उसकी इस दुष्टतापूर्ण ललकार को सुनकर भगवान श्रीहरि का क्रोध और भी उग्र हो गया। भगवान ने कहा— "अरे दुराचारी और मूढ़ दानव! मेरे सम्मुख आकर मृत्यु को आमंत्रण देने वाले, अब मेरी इन भुजाओं के प्रताप को देख!" ।

यह कहकर भगवान विष्णु ने अपने दिव्य धनुष (शार्ङ्ग) से बाणों की अनवरत वर्षा आरंभ कर दी। सर्प के समान फुफकारते हुए भगवान के वे दिव्य और तीक्ष्ण बाण दानवों की सेना पर कहर बनकर टूटने लगे 0। सामने आए हुए दुष्ट दानव भगवान के अमोघ बाणों से कट-कटकर धरती पर गिरने लगे। दानव सेना में हाहाकार मच गया और वे भय से विह्वल हो उठे ।

तत्पश्चात भगवान श्रीहरि ने दैत्य-सेना के समूल नाश के लिए अपने अत्यंत प्रज्वलित और अमोघ 'सुदर्शन चक्र' का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र के भीषण तेज और प्रहार से छिन्न-भिन्न होकर सैकड़ों-हजारों महापराक्रमी दैत्य योद्धा एक ही पल में मौत के मुख में समा गए और भस्म हो गए । देखते ही देखते मुर दानव की संपूर्ण विशाल सेना का भगवान विष्णु ने संहार कर दिया。

दस हजार वर्षों का महायुद्ध

अब उस विशाल रणभूमि में केवल महापराक्रमी मुर दानव ही अकेला जीवित बचा था 0। भगवान विष्णु ने अपने तीक्ष्ण अस्त्रों और बाणों से उस पर प्रहार करना निरंतर जारी रखा, परंतु वह दानव ऐसा मायावी और बलशाली था कि भगवान के वे अत्यंत तीक्ष्ण बाण भी उस महाबली असुर के शरीर से टकराकर पुष्पों के समान होकर भूमि पर गिर जाते थे । अस्त्रों-शस्त्रों का उस दानव पर कोई विशेष प्रभाव नहीं हो रहा था。

जब अस्त्र-शस्त्र निष्फल होने लगे, तब भगवान श्रीहरि और मुर दानव के मध्य भयंकर मल्लयुद्ध (बाहुयुद्ध) छिड़ गया । दोनों के मध्य ऐसा भयंकर और अद्भुत युद्ध हुआ जो कल्पों तक स्मरण रखने योग्य था। भगवान विष्णु उस दैत्य के साथ बिना किसी विश्राम के पूरे दस हज़ार (10,000) दिव्य वर्षों तक निरंतर युद्ध करते रहे । इतना सुदीर्घ और घोर संग्राम होने पर भी वह महाबली दानव मुर युद्ध में तनिक भी थका नहीं और न ही वह भगवान से परास्त हुआ。

बदरिकाश्रम गमन और सिंहावती (हेमवती) गुफा में विश्राम

दस हजार वर्षों के अनवरत और थका देने वाले महायुद्ध के पश्चात, भगवान विष्णु ने लीला रचते हुए युद्ध-भूमि से प्रस्थान किया और वे शांत होकर विश्राम करने की इच्छा से हिमालय की कंदराओं में स्थित पवित्र 'बदरिकाश्रम' की ओर चले गए ।

बदरिकाश्रम में 'सिंहावती' (जिसे कुछ स्थानों पर 'हेमवती' नाम से भी जाना जाता है) नाम की एक अत्यंत विशाल और रहस्यमयी गुफा थी । वह गुफा आकार में अत्यंत विशाल थी और उसकी लंबाई बारह (12) योजन (लगभग 96 मील) थी । उस बारह योजन लंबी गुफा का केवल एक ही द्वार था ।

भगवान विष्णु उस सिंहावती (हेमवती) गुफा के भीतर प्रविष्ट हुए और थकावट मिटाने हेतु योगनिद्रा की गोद में शयन करने लगे ।

उधर, वह महाअहंकारी और दुष्ट दानव मुर भगवान श्रीहरि का पीछा करता हुआ उनके पीछे-पीछे उसी गुफा के द्वार तक पहुंच गया। गुफा के भीतर प्रवेश करने पर जब उस दुष्ट ने देखा कि भगवान श्रीहरि गहरी योगनिद्रा में शयन कर रहे हैं, तो उसे अत्यंत हर्ष हुआ । उस मूर्ख दानव ने अपने मन में विचार किया— "यह विष्णु देवताओं का रक्षक है और हम दानवों को भय देने वाला सबसे बड़ा शत्रु देवता है। आज यह युद्ध से थककर घोर निद्रा में पड़ा है। अतः निस्संदेह यह एक उत्तम अवसर है। आज मैं इसे इसी निद्रा की अवस्था में मार डालूँगा और हम दैत्यों को सदा के लिए निर्भय कर दूँगा" ।

भगवान विष्णु के शरीर से दिव्य कन्या का प्रकट होना और असुर का वध

दानव मुर ने जैसे ही भगवान विष्णु को मारने के उद्देश्य से अपना अस्त्र उठाया और उन पर प्रहार करने के लिए उद्यत हुआ, उसी क्षण एक परम आश्चर्यजनक और अलौकिक घटना घटी ।

योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान विष्णु के शरीर के दिव्य तेज और योगमाया से एक अत्यंत रूपवती, कांतिमान और सौभाग्यशालिनी कन्या प्रकट हुई । वह दिव्य कन्या साक्षात् भगवान के तेज के अंश से उत्पन्न हुई थी। उसका रूप उज्ज्वल और करोड़ों सूर्यों के समान कांतिमय था। वह विविध प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से पूर्णतः सुसज्जित थी और युद्ध-कला में अत्यंत निपुण थी ।

उस दिव्य कन्या ने भगवान की रक्षा हेतु सामने खड़े उस महाअहंकारी राक्षस मुर को युद्ध के लिए कठोर स्वर में ललकारा । मुर दानव यह देखकर अचंभित रह गया कि यह कन्या कहाँ से आ गई। तदुपरांत, मुर दानव और उस तेजस्विनी कन्या के मध्य घोर युद्ध आरंभ हो गया ।

वह कन्या साक्षात् ईश्वरीय शक्ति थी। जब उस कन्या ने देखा कि वह भयानक असुर किसी भी प्रकार से पीछे नहीं हट रहा है और निरंतर प्रहार कर रहा है, तो उस महादेवी ने अपने अत्यंत प्रचंड और अकल्पनीय दिव्य तेज से युक्त होकर उस दानव की ओर देखकर एक भयंकर 'हुंकार' भरी ।

उस देवी के उस महाभयंकर हुंकार मात्र की अग्नि से वह महापराक्रमी मुर दानव उसी क्षण जलकर भस्म हो गया और राख के ढेर में परिवर्तित हो गया । जो महाअसुर दस हजार वर्षों के निरंतर युद्ध में भी भगवान श्रीहरि से पराजित नहीं हुआ था, वह उस परम तेजस्विनी देवी के एक हुंकार से ही तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो गया ।

भगवान विष्णु का जागरण एवं दिव्य कन्या को “एकादशी” नाम और वरदान देना

कुछ समय पश्चात, जब भगवान श्रीहरि की योगनिद्रा पूर्ण हुई और वे जागे, तो उन्होंने देखा कि वह महाभयंकर दानव मुर, जो उनका अजेय शत्रु था, उनके सामने राख का ढेर बना पड़ा है । उसी के समीप एक अत्यंत रूपवती, कांतिमय एवं दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त देवी हाथ जोड़े अत्यंत विनयपूर्वक खड़ी है ।

यह देखकर भगवान विष्णु ने घोर आश्चर्य से पूछा— "हे देवी! तुम कौन हो? मेरे इस महाभयंकर और उग्र शत्रु मुर दानव का, जिसने इंद्र सहित सभी देवताओं को भयभीत कर दिया था, उसका वध किसने किया है?" ।

उस देवी ने विनम्रतापूर्वक शीश झुकाकर उत्तर दिया— "हे स्वामिन्! हे प्रभो! यह दुष्ट दानव आपको योगनिद्रा में लीन देखकर आपको मारने के लिए उद्यत हुआ था। उसी क्षण मैं आपके ही शरीर के दिव्य तेज और आपकी योगमाया से उत्पन्न हुई। हे जगन्नाथ! आपके ही प्रताप और आपके ही प्रसाद (कृपा) से मैंने इस महादैत्य से युद्ध किया और इसका वध किया है" ।

कन्या के यह विनयपूर्ण और सत्य वचन सुनकर भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए ।

भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे कल्याणी! हे देवी! तुम्हारे इस महान कर्म से त्रिलोकी के समस्त मुनिगण और देवता अत्यंत आनंदित हुए हैं । तुमने संपूर्ण देवताओं को एक महान संकट से बचाया है और तुम्हारे इस अपूर्व पराक्रम से मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जैसी रुचि हो, तुम मुझसे वह वर मांग लो। देव दुर्लभ होने पर भी वह वर मैं तुम्हें अवश्य प्रदान करूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है" ।

भगवान विष्णु के इन कृपापूर्ण वचनों को सुनकर वह कन्या बोली— "हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि आपकी कृपा से मैं सब तीर्थों में प्रधान, समस्त विघ्नों का सर्वथा नाश करने वाली तथा सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाली देवी होऊँ । हे माधव! जो मनुष्य आपमें पूर्ण भक्ति रखते हुए मेरे उत्पन्न होने के इस दिन श्रद्धापूर्वक उपवास करे, अथवा संध्या के समय भोजन ग्रहण करे (नक्त), अथवा दिन में एक समय भोजन (एकभुक्त) करके भी मेरे इस व्रत का पालन करे, उसके समस्त पापों का आप नाश करें और उसे आप धन, धर्म, सुख, संपत्ति और अंत में मोक्ष प्रदान करें। हे जनार्दन! यही मेरी अभिलाषा है" ।

भगवान श्रीहरि ने 'तथास्तु' (ऐसा ही हो) कहकर उस देवी को यह वरदान प्रदान किया ।

तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं— "हे धर्मराज! चूँकि उस दिव्य शक्तिरूपा कन्या का प्राकट्य मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन मेरे ही शरीर से हुआ था, इसलिए मैंने उस दिन उस देवी का नाम 'एकादशी' रखा और संसार में वह 'उत्पन्ना एकादशी' के नाम से पूजित हुई ।

हे कुंतीपुत्र! मेरी आध्यात्मिक शक्ति के रूप में उत्पन्न हुई यह 'एकादशी' तिथि मुझे अन्य सभी तिथियों में सर्वाधिक प्रिय होगी । जो भी भक्त श्रद्धा और भक्तिभाव से इस उत्पन्ना एकादशी से आरंभ करके एकादशी का व्रत करेंगे, वे मेरे सायुज्य को प्राप्त करेंगे और उनके समस्त पापों का समूल नाश हो जाएगा। आपके भक्त वही होंगे जो मेरे भक्त हैं।"


पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)

कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इस पावन उत्पन्ना एकादशी व्रत की पारंपरिक फलश्रुति और माहात्म्य का श्रवण कराते हुए कहते हैं—

"हे राजन्! एकादशी के समान पापनाशक व्रत इस संपूर्ण चराचर जगत में दूसरा कोई नहीं है 0। हे युधिष्ठिर! जो पुण्य शंखोद्धार क्षेत्र में स्नान करने और गदाधर भगवान के दर्शन करने से मनुष्य को प्राप्त होता है, वह पुण्य एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें (16वें) भाग के बराबर भी नहीं है ।

इस पावन एकादशी व्रत के पुण्य की महिमा का वर्णन करते हुए जो शास्त्रीय तुलनात्मक प्रमाण है, वह इस प्रकार है:

पुण्यकर्म / अनुष्ठान एकादशी व्रत की तुलना में फल
शंखोद्धार तीर्थ स्नान एवं गदाधर दर्शन एकादशी के पुण्य के 16वें भाग के समान भी नहीं
व्यतिपात योग में दान लाख गुना फल, परंतु एकादशी से कम
संक्रांति पर दान चार लाख गुना फल, परंतु एकादशी से कम
सूर्य एवं चंद्र ग्रहण पर कुरुक्षेत्र स्नान एकादशी के दिन व्रत करने से सहज ही प्राप्त
अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान एकादशी व्रत का पुण्य इससे 100 गुना अधिक है
1 लाख तपस्वियों को 60 वर्ष तक भोजन कराना एकादशी व्रत का पुण्य इससे 10 गुना अधिक है
वेद-वेदांग ज्ञाता ब्राह्मण को 1000 गौ दान (सहस्र गोदान) एकादशी व्रत का पुण्य इससे 10 गुना अधिक है

हे राजन्! विद्यादान से दस गुना फल अन्न दान का माना गया है, परंतु एकादशी व्रत के पुण्य का कोई पार नहीं है, यह हजारों यज्ञों से भी अधिक फल देने वाला है और स्वयं देवताओं के लिए भी दुर्लभ है ।

जो मनुष्य एकादशी के दिन किसी भी रूप में अन्न ग्रहण करता है, वह साक्षात् पाप का ही भक्षण करता है । जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और भक्तिपूर्वक मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की इस उत्पन्ना एकादशी का उपवास करता है, वह मृत्यु के पश्चात परम वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है, जहाँ साक्षात् भगवान गरुड़ध्वज विराजमान रहते हैं 0।

जो मानव हर समय इस एकादशी के माहात्म्य का पाठ करता है, उसे सहस्र गोदानों (हजारों गायों के दान) के पुण्य का फल प्राप्त होता है 0। जो दिन या रात में भक्तिपूर्वक इस उत्पन्ना एकादशी की उत्पत्ति की पावन कथा का केवल श्रवण करते हैं अथवा पठन करते हैं, वे निस्संदेह ब्रह्म हत्या, गुरुतल्प-गमन आदि जैसे घोर पापों से भी मुक्त हो जाते हैं 0।

विष्णु की भक्ति करने वाला जो भी मनुष्य विष्णु भक्त के मुख से इस मंगलदायक और पापनाशक कथा को सुनता है, वह संसार के समस्त सुखों को भोगकर अनंत काल तक वैकुण्ठ लोक में निवास करता है । एकादशी के इस माहात्म्य का एक पद भी श्रवण करने वाले के पाप निस्संदेह दूर हो जाते हैं क्योंकि वैष्णव धर्म के समान सत्य, सनातन और पवित्र व्रत दूसरा कोई नहीं है" ।

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी व्रत की संपूर्ण और अक्षुण्ण कथा का उपदेश दिया।

॥ इति पद्म पुराणे युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवादे उत्पन्ना एकादशी व्रत-कथा सम्पूर्णा ॥

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