विस्तृत उत्तर
हिंदू पौराणिक ग्रंथों में राक्षस सबसे प्रमुख, शक्तिशाली और विध्वंसकारी अमानवीय योनि है। राक्षस शब्द संस्कृत की 'रक्षामः' धातु से उत्पन्न हुआ है। राक्षस अत्यंत मायावी होते हैं और इच्छानुसार रूप बदलने, पशुओं, दानवों या सुंदर स्त्रियों का रूप धारण करने में सक्षम होते हैं। इनका बल सायं काल और विशेषकर अमावस्या की अंधियारी रात में अत्यधिक बढ़ जाता है, तथा सूर्योदय होने पर इनकी शक्ति क्षीण हो जाती है। शास्त्रों में उन्हें निशाचर, क्रव्याद और नृचक्षस भी कहा गया है। वे वैदिक यज्ञों, प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों से घृणा करते हैं और उन्हें नष्ट करने का प्रयास करते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक

