विस्तृत उत्तर
रौहिण मुहूर्त श्राद्ध के तीन शास्त्रीय मुहूर्तों में दूसरा मुहूर्त है, जो तर्पण और पिण्डदान के लिए विशेष समय माना गया है। शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार रौहिण मुहूर्त कुतुप के ठीक बाद का समय है, जो तर्पण और पिण्डदान की प्रक्रिया के लिए उत्तम है। इसका समय अपराह्न 12:44 से अपराह्न 01:34 तक है, अर्थात् लगभग 50 मिनट का यह विशेष समय।
तीन मुहूर्तों में इसका स्थान दूसरा है। पहला कुतुप मुहूर्त 11:53 से 12:44 तक, दूसरा रौहिण मुहूर्त 12:44 से 01:34 तक, और तीसरा अपराह्न काल 01:34 से 04:04 तक। इसका विशेष महत्व कई कारणों से है। पहला कारण यह है कि यह कुतुप के ठीक बाद का समय है, अर्थात् कुतुप मुहूर्त समाप्त होते ही रौहिण आरंभ होता है, और दोनों एक के बाद एक आते हैं। दूसरा कारण यह है कि यह तर्पण के लिए उत्तम है, क्योंकि तर्पण की प्रक्रिया इस मुहूर्त में सर्वोत्तम होती है, और जल अर्पण का यह सर्वश्रेष्ठ समय है। तीसरा कारण यह है कि यह पिण्डदान के लिए भी उत्तम है, क्योंकि पिण्डदान की प्रक्रिया इस मुहूर्त में पवित्र होती है, और तीन पीढ़ियों के पितरों को पिण्ड अर्पण किया जाता है।
इस मुहूर्त में कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं। पहला है तर्पण, जिसमें शुद्ध जल, कुशा और काले तिल का उपयोग होता है, दक्षिण दिशा की ओर मुख रखा जाता है, गोत्र-नाम का उच्चारण होता है, और पितृ तीर्थ से जल अर्पण किया जाता है। दूसरा है पिण्डदान, जिसमें पके चावल, दूध, घी, शहद, जौ और तिल से पिण्ड बनाए जाते हैं, वेदी पर कुशा बिछाकर पिण्ड स्थापित किए जाते हैं, और तीन पिण्ड तीन पीढ़ियों के प्रतीक होते हैं।
इस मुहूर्त के विशेष होने का कारण यह है कि कुतुप में पितरों का स्वागत होता है, रौहिण में मुख्य कर्म तर्पण-पिण्डदान होता है, और अपराह्न में ब्राह्मण भोजन होता है, इस प्रकार तीनों का सूक्ष्म क्रम है। व्यावहारिक मार्गदर्शन के अनुसार 12:44 बजे ठीक तर्पण आरंभ करना चाहिए, 01:34 तक तर्पण और पिण्डदान पूरा कर लेना चाहिए, और फिर अपराह्न काल में ब्राह्मण भोजन का आयोजन करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के रूप में शास्त्रों में श्राद्ध के लिए दिन के तीन विशिष्ट मुहूर्तों को सबसे पवित्र माना गया है। शास्त्रीय स्रोत के रूप में वायु पुराण, आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति इसका प्रमाण देते हैं। निष्कर्षतः रौहिण मुहूर्त अपराह्न 12:44 से अपराह्न 01:34 तक का विशेष समय है, यह कुतुप के ठीक बाद का मुहूर्त है, जो तर्पण और पिण्डदान की प्रक्रिया के लिए उत्तम है।
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