विस्तृत उत्तर
देवी भागवत पुराण के नवम स्कंध के चौथे अध्याय में भगवान नारायण ने देवर्षि नारद को उस 'सरस्वती कवच' का उपदेश दिया है जो साधक के शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है। यह कवच अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों से एक ढाल की तरह काम करता है:
शिर: ऐं श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा (मेरे संपूर्ण मस्तक की रक्षा करें)
भाल: श्रीं वाग्देवत्यै स्वाहा (मेरे माथे की रक्षा करें)
कर्ण: ऐं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा (मेरे कानों की रक्षा करें)
नेत्र: ऐं श्रीं ह्रीं भगवत्यै सरस्वत्यै स्वाहा (मेरी आँखों की रक्षा करें)
नासिका: ऐं ह्रीं वाक्वादिन्यै स्वाहा (मेरी नाक की रक्षा करें)
ओष्ठ एवं दंत: ऐं ह्रीं विद्याधिष्ठात्री देव्यै स्वाहा (होंठों की रक्षा), ऐं ह्रीं ब्रह्मैयै स्वाहा (दांतों की रक्षा)
कंठ एवं वक्ष: ऐं श्रीं ह्रीं (कंठ), ऐं ह्रीं विद्याधिष्ठात्री देव्यै स्वाहा (छाती)
हस्त: ऐं ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहा (मेरे हाथों की रक्षा करें)
यह कवच पूर्णतः तांत्रिक बीज मंत्रों (ऐं, ह्रीं, श्रीं, क्लीं) से युक्त है, जो साधक के सूक्ष्म चक्रों को जाग्रत करता है।
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