विस्तृत उत्तर
वैदिक साहित्यों, श्रुतियों, उपनिषदों और प्रामाणिक अष्टादश पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मुख्य रूप से चौदह लोकों में विभक्त किया गया है। इन समस्त चौदह लोकों के शीर्ष पर स्थित 'सत्यलोक', जिसे शास्त्रों में 'ब्रह्मलोक' के नाम से भी जाना जाता है, इस भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च, सबसे पवित्र और परम सात्विक लोक है। यह वह परम लोक है जहाँ रजोगुण और तमोगुण का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है और यह लोक पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्वगुण से निर्मित है। सत्यलोक भौतिक सृष्टि की अन्तिम सीमा है जिसके ठीक पार आवरणों को पार करने के पश्चात शाश्वत वैकुण्ठ ग्रहों से युक्त चिदाकाश (सनातन आध्यात्मिक जगत) का आरम्भ होता है। सत्यलोक को स्वयं सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा का निवास स्थान माना जाता है इसी कारण इसे ब्रह्मलोक कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार सत्यलोक वह स्थान है जहाँ पहुँचने के पश्चात सामान्यतः जीव का भौतिक जगत में पुनर्जन्म नहीं होता और वह महाप्रलय के समय ब्रह्मा जी के साथ परम मोक्ष को प्राप्त करता है।
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