विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत (२.२.२७) में सत्यलोक के वातावरण की सबसे बड़ी विशेषता वर्णित है — न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नार्तिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित्। सत्यलोक में त्रितापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक दुखों) का अभाव इसलिए है क्योंकि यह लोक पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्वगुण से निर्मित है जहाँ रजोगुण और तमोगुण का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है। सत्यलोक का स्वयं का प्रकाश इतना तीव्र, सात्विक और चिन्मय है कि यहाँ किसी भी प्रकार का अंधकार, छाया या रात्रि का अस्तित्व नहीं है। यहाँ ब्रह्मा और सरस्वती का वास है और यहाँ के निवासी वेदों के मूर्त स्वरूप हैं। इन सबका संयुक्त प्रभाव यह होता है कि यहाँ कोई भी भौतिक क्लेश नहीं पहुँच सकता।
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