विस्तृत उत्तर
शैव सिद्धांत (शैव आगम पद्धति) भगवान शिव की उपासना की प्रमुख दार्शनिक और कर्मकांडीय पद्धति है, विशेषतः दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में अत्यंत प्रचलित।
शैव सिद्धांत का मूल दर्शन
तीन मूल तत्व — पति (शिव), पशु (जीवात्मा), पाश (बंधन/माया)। शिव कृपा से जीव पाश से मुक्त होता है।
शैव सिद्धांत में पूजा विधि
1आत्म शुद्धि (भूत शुद्धि)
शिव पूजा से पहले साधक अपने शरीर को 'शिवमय' करता है। भूत शुद्धि — पंचतत्वों का शिव में विलय और फिर शिव से नवीन शरीर की भावना।
2न्यास
अंगन्यास और करन्यास — शरीर के विभिन्न अंगों पर शिव मंत्रों का न्यास।
3पंचाक्षर मंत्र
ॐ नमः शिवाय' — यह शैव सिद्धांत का मूल मंत्र है। इसके पाँच अक्षर (न, मः, शि, वा, य) पंचतत्वों और पंचकृत्यों (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह) का प्रतीक।
4शिवलिंग पूजन
शिवलिंग पर अभिषेक — जल, दूध, दही, घी, मधु, शक्कर (पंचामृत), बिल्वपत्र, धतूरा, आक पुष्प।
5आगमिक षोडशोपचार
वैष्णव षोडशोपचार के समान, किन्तु शैव आगमों (कामिक, मृगेन्द्र आदि) के मंत्रों से।
6रुद्राभिषेक
रुद्र सूक्त (शतरुद्रीय/नमकम्-चमकम्) के पाठ के साथ शिवलिंग पर अभिषेक — शैव पूजा का सर्वोच्च अनुष्ठान।
7शिवाचार्य (पुजारी)
शैव सिद्धांत मंदिरों में शिवाचार्य ही पूजा करता है। वह दीक्षा प्राप्त, शैव आगम में पारंगत होता है।
8दक्षिण भारतीय विशेषता
- ▸तिरुमुरै (तमिल शैव भक्ति काव्य — तेवारम, तिरुवाचकम) का पाठ।
- ▸63 नायनारों (शैव संतों) की परम्परा।
- ▸शिव मंदिरों में पंचकाल पूजा (उषःकाल, प्रातःकाल, मध्याह्न, सायंकाल, अर्धरात्रि)।
विशेष: शैव सिद्धांत कश्मीर शैवदर्शन से भिन्न है। कश्मीर शैव अद्वैत (शिव-शक्ति एक) मानते हैं, जबकि दक्षिण शैव सिद्धांत बहुलवादी (पति-पशु-पाश भिन्न) है।





