विस्तृत उत्तर
उत्तर भारत में प्रचलित पौराणिक पूजा पद्धति पुराणों, स्मृतियों और लोक परम्परा के मिश्रण पर आधारित है।
उत्तर भारतीय पौराणिक पूजा की विशेषताएँ
1. षोडशोपचार (16 उपचार): आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवीत/आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा-नमस्कार। यह सबसे विस्तृत पूजा विधान है।
2. पंचदेव पूजन: गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा, सूर्य — इन पंचदेवों का पूजन प्रत्येक पूजा में अनिवार्य।
3. कलश स्थापना: प्रायः सभी विशेष पूजाओं में जल भरे कलश की स्थापना। कलश में गंगाजल, आम पत्ते, नारियल।
4. हवन/यज्ञ: अग्नि स्थापन, आहुतियाँ, स्विष्टकृत होम, पूर्णाहुति। उत्तर भारत में हवन पूजा का अनिवार्य अंग माना जाता है।
5. आरती: प्रत्येक पूजा का समापन आरती से। कपूर, घी के दीपक, घण्टा-शंख के साथ। 'ॐ जय जगदीश हरे...' सर्वाधिक प्रचलित।
6. कथा-व्रत: व्रत के साथ सम्बंधित कथा का पाठ या श्रवण — सत्यनारायण, शिवरात्रि, एकादशी आदि।
7. भाषा: मंत्र संस्कृत में, किन्तु कथाएँ और स्तोत्र हिन्दी/अवधी/ब्रजभाषा में भी प्रचलित। तुलसीकृत रामचरितमानस, हनुमान चालीसा उत्तर भारत की विशिष्ट पहचान।
8. प्रसाद: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), चरणामृत, पंजीरी, भोग — ये उत्तर भारतीय प्रसाद परम्परा की विशेषता।
9. संगीत-भजन: भजन-कीर्तन, भगवान के गुणगान, लोक गीत पूजा का अंग।
विशेष: उत्तर भारत में पौराणिक पद्धति मुख्यतः पुराणों और स्मृतियों पर आधारित है, जबकि शुद्ध वैदिक विधि (यज्ञ-प्रधान, छन्दोबद्ध मंत्र) अपेक्षाकृत कम प्रचलित है। वर्तमान पूजा में वैदिक और पौराणिक दोनों तत्वों का मिश्रण मिलता है।





