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पूजा पद्धति📜 पुराण, स्मृतिग्रंथ, नित्यकर्म पूजन पद्धति, कर्मकांड प्रदीप2 मिनट पठन

उत्तर भारत में पौराणिक पद्धति से पूजा कैसे होती है?

संक्षिप्त उत्तर

उत्तर भारत पौराणिक पूजा: षोडशोपचार → पंचदेव पूजन → कलश स्थापना → हवन → आरती (ॐ जय जगदीश...) → कथा-व्रत → रामचरितमानस/हनुमान चालीसा → प्रसाद (पंचामृत) → भजन-कीर्तन। पुराण-स्मृति आधारित, वैदिक मिश्रण।

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विस्तृत उत्तर

उत्तर भारत में प्रचलित पौराणिक पूजा पद्धति पुराणों, स्मृतियों और लोक परम्परा के मिश्रण पर आधारित है।

उत्तर भारतीय पौराणिक पूजा की विशेषताएँ

1. षोडशोपचार (16 उपचार): आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवीत/आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा-नमस्कार। यह सबसे विस्तृत पूजा विधान है।

2. पंचदेव पूजन: गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा, सूर्य — इन पंचदेवों का पूजन प्रत्येक पूजा में अनिवार्य।

3. कलश स्थापना: प्रायः सभी विशेष पूजाओं में जल भरे कलश की स्थापना। कलश में गंगाजल, आम पत्ते, नारियल।

4. हवन/यज्ञ: अग्नि स्थापन, आहुतियाँ, स्विष्टकृत होम, पूर्णाहुति। उत्तर भारत में हवन पूजा का अनिवार्य अंग माना जाता है।

5. आरती: प्रत्येक पूजा का समापन आरती से। कपूर, घी के दीपक, घण्टा-शंख के साथ। 'ॐ जय जगदीश हरे...' सर्वाधिक प्रचलित।

6. कथा-व्रत: व्रत के साथ सम्बंधित कथा का पाठ या श्रवण — सत्यनारायण, शिवरात्रि, एकादशी आदि।

7. भाषा: मंत्र संस्कृत में, किन्तु कथाएँ और स्तोत्र हिन्दी/अवधी/ब्रजभाषा में भी प्रचलित। तुलसीकृत रामचरितमानस, हनुमान चालीसा उत्तर भारत की विशिष्ट पहचान।

8. प्रसाद: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), चरणामृत, पंजीरी, भोग — ये उत्तर भारतीय प्रसाद परम्परा की विशेषता।

9. संगीत-भजन: भजन-कीर्तन, भगवान के गुणगान, लोक गीत पूजा का अंग।

विशेष: उत्तर भारत में पौराणिक पद्धति मुख्यतः पुराणों और स्मृतियों पर आधारित है, जबकि शुद्ध वैदिक विधि (यज्ञ-प्रधान, छन्दोबद्ध मंत्र) अपेक्षाकृत कम प्रचलित है। वर्तमान पूजा में वैदिक और पौराणिक दोनों तत्वों का मिश्रण मिलता है।

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शास्त्रीय स्रोत
पुराण, स्मृतिग्रंथ, नित्यकर्म पूजन पद्धति, कर्मकांड प्रदीप
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