विस्तृत उत्तर
पूजा कर सकता है — पर नशे में नहीं।
गीता (9.30): *'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्'* — दुराचारी भी सच्ची भक्ति करे = साधु। ईश्वर किसी को नहीं ठुकराते।
शर्तें: पूजा समय = शुद्ध अवस्था (नशा नहीं)। सुबह स्नान+शुद्ध मन → पूजा = मान्य। शाम शराब पी → अगली सुबह शुद्ध → पूजा = ठीक। नशे में पूजा = अपमान।
शास्त्रीय: मद्यपान = तामसिक (गीता 17.10)। पूजा = सात्विक। दोनों विपरीत — पर पूजा = शराब छोड़ने का मार्ग भी। जो भक्ति करने लगे = धीरे-धीरे बुरी आदतें छूटती।




