विस्तृत उत्तर
भस्म (विभूति) शिव का स्वरूप और शिव पूजा का अभिन्न अंग है:
भस्म का महत्व
शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव सदैव भस्म रमाते हैं — भस्म वैराग्य, त्याग और अनित्यता का प्रतीक है। जिस प्रकार सब कुछ जलकर भस्म हो जाता है, वैसे ही साधक को अहंकार और मोह का त्याग कर भस्म की भांति निर्लिप्त होना चाहिए।
सही तरीका — त्रिपुंड
शिव भक्त ललाट (माथे) पर तीन आड़ी (क्षैतिज) रेखाओं में भस्म लगाते हैं — इसे 'त्रिपुंड' कहते हैं।
लगाने की विधि
- 1शुद्ध भस्म (गाय के गोबर से बनी, यज्ञ भस्म, या बिल्व काष्ठ भस्म) लें।
- 2दाहिने हाथ की तीन अंगुलियों (अनामिका, मध्यमा, तर्जनी) में भस्म लें।
- 3ललाट पर बाएं से दाएं तीन आड़ी रेखाएं खींचें।
- 4त्रिपुंड भ्रूमध्य (दोनों भौंहों के बीच) से कान तक फैला हो।
मंत्र
भस्म लगाते समय जाबालोपनिषद् का मंत्र:
ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम्॥
या सरल मंत्र: 'ॐ नमः शिवाय' बोलते हुए भस्म लगाएं।
कहां-कहां लगाएं (विस्तृत विधि)
शैव आगम में 32 या 16 स्थानों पर भस्म लगाने का विधान है:
- ▸ललाट, भुजाएं, वक्ष, नाभि, दोनों कंधे — ये प्रमुख स्थान हैं।
- ▸सामान्य भक्तों के लिए केवल ललाट पर त्रिपुंड पर्याप्त।
किस भस्म का प्रयोग करें
- ▸यज्ञ/हवन की भस्म सर्वोत्तम।
- ▸गाय के गोबर से बनी भस्म शुभ।
- ▸बिल्व, पीपल या पलाश काष्ठ की भस्म भी उत्तम।
- ▸बाजार की पैकेट विभूति भी स्वीकार्य।





