विस्तृत उत्तर
सिद्ध मंत्र: वह मंत्र जो चैतन्य (जागृत/सक्रिय) है — जिसका पूर्ण पुरश्चरण हो चुका, या गुरु ने प्राण-शक्ति डालकर प्रदान किया।
असिद्ध मंत्र: वह मंत्र जो अभी 'सोया' (निद्रित/अचैतन्य) है — जिसका पुरश्चरण नहीं हुआ, या बिना दीक्षा केवल पुस्तक/इंटरनेट से पढ़ा।
भेद
- ▸सिद्ध: तत्काल/शीघ्र फल। चैतन्य ऊर्जा। संकल्प सिद्ध होते हैं।
- ▸असिद्ध: फल विलंबित/न्यून। ऊर्जा क्षीण। कामना पूर्ति अनिश्चित।
मंत्र सिद्ध कैसे होता है
- 1पुरश्चरण: सवा लाख जप + दशांश हवन + तर्पण + मार्जन + ब्राह्मण भोजन।
- 2गुरु दीक्षा: गुरु प्राण-शक्ति डालकर मंत्र दे — मंत्र 'जागृत'।
- 3दीर्घकालीन नियमित जप: वर्षों की नियमित भक्ति = मंत्र स्वतः सिद्ध।
सामान्य भक्त: नाम जप (राम, कृष्ण) = सदा 'जागृत' — दीक्षा/पुरश्चरण की आवश्यकता नहीं। भगवान का नाम स्वयं सिद्ध है।





