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सिद्ध मंत्र और असिद्ध मंत्र में क्या भेद है?

संक्षिप्त उत्तर

सिद्ध = चैतन्य/जागृत (पुरश्चरण पूर्ण या गुरु दीक्षा) → शीघ्र फल। असिद्ध = निद्रित (बिना पुरश्चरण/दीक्षा) → विलंबित फल। सिद्ध कैसे: पुरश्चरण, गुरु दीक्षा, दीर्घकालीन नियमित जप। नाम जप (राम/कृष्ण) = सदा सिद्ध — दीक्षा अनिवार्य नहीं।

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विस्तृत उत्तर

सिद्ध मंत्र: वह मंत्र जो चैतन्य (जागृत/सक्रिय) है — जिसका पूर्ण पुरश्चरण हो चुका, या गुरु ने प्राण-शक्ति डालकर प्रदान किया।

असिद्ध मंत्र: वह मंत्र जो अभी 'सोया' (निद्रित/अचैतन्य) है — जिसका पुरश्चरण नहीं हुआ, या बिना दीक्षा केवल पुस्तक/इंटरनेट से पढ़ा।

भेद

  • सिद्ध: तत्काल/शीघ्र फल। चैतन्य ऊर्जा। संकल्प सिद्ध होते हैं।
  • असिद्ध: फल विलंबित/न्यून। ऊर्जा क्षीण। कामना पूर्ति अनिश्चित।

मंत्र सिद्ध कैसे होता है

  1. 1पुरश्चरण: सवा लाख जप + दशांश हवन + तर्पण + मार्जन + ब्राह्मण भोजन।
  2. 2गुरु दीक्षा: गुरु प्राण-शक्ति डालकर मंत्र दे — मंत्र 'जागृत'।
  3. 3दीर्घकालीन नियमित जप: वर्षों की नियमित भक्ति = मंत्र स्वतः सिद्ध।

सामान्य भक्त: नाम जप (राम, कृष्ण) = सदा 'जागृत' — दीक्षा/पुरश्चरण की आवश्यकता नहीं। भगवान का नाम स्वयं सिद्ध है।

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शास्त्रीय स्रोत
मंत्र शास्त्र, तंत्र शास्त्र
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