विस्तृत उत्तर
आयुर्वेद में 'ताम्र जल' का उल्लेख अनेक ग्रंथों में है। तांबे के बर्तन में पानी रखना भारत में सदियों पुरानी परंपरा है और इसके पीछे वास्तविक वैज्ञानिक आधार है।
वैज्ञानिक प्रक्रिया — जब पानी तांबे के संपर्क में 6-8 घंटे रहता है, तो 'ओलिगोडायनेमिक प्रभाव' (Oligodynamic Effect) होता है। तांबे के आयन (Cu²⁺ ions) पानी में मिल जाते हैं।
बैक्टीरिया नष्ट होते हैं — तांबे के आयन E. coli, Salmonella, Vibrio cholerae (हैजे का कीटाणु) और Staphylococcus जैसे हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने भी तांबे को एंटीमाइक्रोबियल धातु के रूप में मान्यता दी है।
AIIMS और अन्य शोध — AIIMS और अन्य संस्थाओं के शोधों में पाया गया कि तांबे के बर्तन में 16 घंटे रखे पानी में डायरिया पैदा करने वाले बैक्टीरिया की संख्या शून्य हो गई।
पाचन सुधार — ताम्र जल पाचन तंत्र को उत्तेजित करता है और पेट में रहने वाले अनावश्यक सूक्ष्म जीवों को नियंत्रित करता है।
सावधानी:
— तांबे का पानी 24 घंटे से अधिक न रखें — अधिक तांबा हानिकारक हो सकता है।
— पानी ठंडा रखें — गर्म करने पर तांबे की मात्रा बढ़ जाती है।
— तांबे के बर्तन में खट्टे पदार्थ न मिलाएँ।
— जिन्हें Wilson's disease है, वे तांबे का पानी न पिएँ।
— WHO के अनुसार पानी में तांबे की अनुमत मात्रा 2mg/litre है।





