विस्तृत उत्तर
गंगा जल की विशेषताओं पर भारतीय और विदेशी वैज्ञानिकों दोनों ने शोध किए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण खोज बैक्टीरियोफेज की है।
बैक्टीरियोफेज क्या है — बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) एक विशेष प्रकार का वायरस है जो बैक्टीरिया को नष्ट करता है। यह मनुष्य को कोई नुकसान नहीं करता।
ऐतिहासिक खोज — 1896 में ब्रिटिश बैक्टीरियोलॉजिस्ट Ernest Hankin ने पाया कि गंगा और यमुना के जल में हैजे के जीवाणु (Vibrio cholerae) मर जाते हैं जबकि सामान्य जल में नहीं। उन्होंने इसे किसी 'अज्ञात एंटीसेप्टिक एजेंट' को बताया। 1917 में Felix d'Herelle ने इन्हें बैक्टीरियोफेज के रूप में पहचाना।
आधुनिक शोध:
IIT Roorkee शोध — गंगा के पानी में बड़ी मात्रा में बैक्टीरियोफेज पाए गए हैं जो टाइफाइड, हैजा और अन्य रोगजनक बैक्टीरिया को नष्ट कर सकते हैं।
स्व-शुद्धि गुण (Self-purification) — गंगा जल लंबे समय तक खराब नहीं होता। यह इसमें मौजूद बैक्टीरियोफेज, हिमालयी जड़ी-बूटियों के अवशेष, और विशेष खनिजों के संयोजन के कारण है।
ऑक्सीजन धारण क्षमता — गंगा जल में अन्य नदियों की तुलना में अधिक dissolved oxygen होती है — यह उसकी स्व-शुद्धि में सहायक है।
कठिन सत्य — आज गंगा प्रदूषण के कारण कई स्थानों पर इन गुणों में कमी आई है। ऊपरी गंगा (हरिद्वार, ऋषिकेश के पास) में ये गुण अधिक हैं, निचले स्तर पर कम। गंगा की शुद्धि सुनिश्चित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।





