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श्राद्ध विधि⏱ 4 मिनट पठन

तर्पण क्या होता है?

तर्पण वह प्रक्रिया है जिसमें जल से पितरों की प्यास बुझाई जाती है।

संक्षिप्त उत्तर

तर्पण वह प्रक्रिया है जिसमें जल से पितरों की प्यास बुझाई जाती है। कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेकर, दक्षिण की ओर मुख कर, पितरों के गोत्र-नाम का उच्चारण करते हुए, अंगूठे के मूल भाग पितृ तीर्थ से तस्मै स्वधा नमः मंत्र के साथ जल गिराता है।

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विस्तृत उत्तर

तर्पण श्राद्ध की एक प्रमुख प्रक्रिया है, जिसमें जल के माध्यम से पितरों की प्यास बुझाई जाती है। शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार तर्पण वह प्रक्रिया है जिसमें जल के माध्यम से पितरों की प्यास बुझाई जाती है। तर्पण शब्द का मूल अर्थ ही है तृप्ति देने वाला कर्म, अर्थात् पितरों को जल अर्पण कर उन्हें तृप्ति प्रदान करना।

तर्पण की सम्पूर्ण विधि शास्त्रों में अत्यंत स्पष्ट रूप से वर्णित है। कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा, और काले तिल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करता है। इसमें तीन प्रमुख सामग्रियाँ अनिवार्य हैं, अर्थात् शुद्ध जल, कुशा और काले तिल। कर्ता को दोनों हाथ जोड़कर अंजलि बनानी होती है और उसमें ये तीनों सामग्रियाँ रखनी होती हैं। दिशा अनिवार्य रूप से दक्षिण होनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है।

जल गिराने की विधि भी विशेष है। तर्पण करते समय जल को अंगूठे के मूल भाग से गिराया जाता है, जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है। अंगूठे का मूल भाग शास्त्रों में अत्यंत पवित्र स्थान माना गया है, यही पितृ तीर्थ है। वहाँ से गिराया गया जल सीधे पितरों तक पहुँचता है। इस प्रक्रिया के दौरान कर्ता को पितरों के गोत्र और नाम का स्पष्ट और श्रद्धापूर्वक उच्चारण करना होता है।

मंत्र का भी विशेष विधान है। इस समय तस्मै स्वधा नमः मंत्र का उच्चारण शास्त्र-विहित है। यह वह विशिष्ट मंत्र है जो शास्त्रों ने तर्पण के समय निर्धारित किया है। स्वधा का अर्थ है पितरों का विशेष अर्पण या आहार, और तस्मै स्वधा नमः अर्थात् उन्हें पितरों को स्वधा नमस्कार है।

तर्पण की पूर्व-तैयारी में कर्ता को पूर्णतः शुद्ध होकर श्वेत धोती धारण करनी चाहिए, अनामिका अंगुली में कुशा से बनी पवित्री पहननी चाहिए, और जनेऊ को अपसव्य अवस्था में रखना चाहिए, अर्थात् दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे। तर्पण का सर्वश्रेष्ठ समय शास्त्रों के अनुसार रौहिण मुहूर्त माना गया है, जो अपराह्न 12:44 से 01:34 तक रहता है। यह कुतुप मुहूर्त के ठीक बाद का समय है और तर्पण-पिण्डदान की प्रक्रिया के लिए उत्तम है।

तर्पण में जल, कुशा और तिल का अत्यंत महत्व है। जल पितरों की प्यास बुझाने का सर्वोच्च माध्यम है। कुशा और काले तिल साक्षात् भगवान वराह के दिव्य शरीर से उत्पन्न हुए हैं, कुशा उनके दिव्य रोमों से और काले तिल उनके पसीने की बूंदों से। इसलिए ये तर्पण में अनिवार्य माने गए हैं। तर्पण का अंतिम उद्देश्य पितरों की प्यास बुझाकर उन्हें तृप्ति प्रदान करना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करना है। यह श्राद्ध का अनिवार्य अंग है, जिसके बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है, और इन्हीं ग्रंथों में तर्पण की पूर्ण विधि वर्णित है।

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