विस्तृत उत्तर
तर्पण में जल की मात्रा शास्त्रोक्त है:
- 1एक अंजलि: प्रत्येक तर्पण में एक अंजलि (दोनों हथेलियों में भरा) जल = पर्याप्त। न बहुत अधिक, न बहुत कम।
- 1तीन बार: प्रत्येक पितर के लिए तीन बार अंजलि जल अर्पित करें। नाम-गोत्र बोलते हुए।
- 1तिल-जौ-कुश सहित: जल में काले तिल, जौ, और कुश (दर्भ) मिलाएँ। केवल जल पर्याप्त नहीं — तिल अनिवार्य।
- 1पितृ तीर्थ मुद्रा: अंगूठे और तर्जनी के बीच (पितृ तीर्थ) से जल गिराएँ। देव तर्पण = अंगुलियों के अग्रभाग से। ऋषि तर्पण = कनिष्ठिका ओर से।
- 1धीमी धारा: जल तीव्रता से न गिराएँ — धीमी, शांत धारा। मन में पितरों का ध्यान।
विशेष: तर्पण जल भूमि पर (दक्षिण दिशा) गिरना चाहिए। पात्र में नहीं, सीधे जमीन/कुश पर। नदी/तालाब में तर्पण करें तो जल सीधे जलाशय में।





