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श्राद्ध-पितृ कर्म📜 गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, मत्स्य पुराण1 मिनट पठन

तर्पण करते समय कितना जल अर्पित करना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

तर्पण जल: एक अंजलि (दोनों हथेलियाँ), प्रति पितर 3 बार। तिल+जौ+कुश अनिवार्य। पितृ तीर्थ (अंगूठा-तर्जनी बीच) से गिराएँ। धीमी धारा, भूमि/दक्षिण दिशा। नदी = सीधे जलाशय।

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विस्तृत उत्तर

तर्पण में जल की मात्रा शास्त्रोक्त है:

  1. 1एक अंजलि: प्रत्येक तर्पण में एक अंजलि (दोनों हथेलियों में भरा) जल = पर्याप्त। न बहुत अधिक, न बहुत कम।
  1. 1तीन बार: प्रत्येक पितर के लिए तीन बार अंजलि जल अर्पित करें। नाम-गोत्र बोलते हुए।
  1. 1तिल-जौ-कुश सहित: जल में काले तिल, जौ, और कुश (दर्भ) मिलाएँ। केवल जल पर्याप्त नहीं — तिल अनिवार्य।
  1. 1पितृ तीर्थ मुद्रा: अंगूठे और तर्जनी के बीच (पितृ तीर्थ) से जल गिराएँ। देव तर्पण = अंगुलियों के अग्रभाग से। ऋषि तर्पण = कनिष्ठिका ओर से।
  1. 1धीमी धारा: जल तीव्रता से न गिराएँ — धीमी, शांत धारा। मन में पितरों का ध्यान।

विशेष: तर्पण जल भूमि पर (दक्षिण दिशा) गिरना चाहिए। पात्र में नहीं, सीधे जमीन/कुश पर। नदी/तालाब में तर्पण करें तो जल सीधे जलाशय में।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, मत्स्य पुराण
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