विस्तृत उत्तर
तंत्र साधना से कुंडलिनी जागरण का वर्णन तंत्रालोक और कुलार्णव तंत्र में है:
कुंडलिनी क्या है
tंत्रालोक: कुंडलिनी = शरीर में स्थित शक्ति। मूलाधार चक्र (रीढ़ के आधार) में सर्पाकार सुषुप्त। जागृत होने पर — सुषुम्ना नाड़ी में ऊर्ध्वगमन — चक्र-चक्र जागृत।
तंत्र साधना से जागरण की विधि
1मंत्र जप
विशेष मंत्र (विशेषतः बीज मंत्र) — मूलाधार में कंपन उत्पन्न करते हैं।
2प्राणायाम
कुंभक प्राणायाम + बंध (मूल बंध, उड्डियान बंध) — प्राण शक्ति को नीचे की ओर धकेलना।
3ध्यान
मूलाधार पर ध्यान — कुंडलिनी शक्ति को जागृत करना।
4शक्तिपात
गुरु की शक्तिपात दीक्षा — तत्काल या क्रमिक कुंडलिनी जागरण।
जागरण के लक्षण
- ▸रीढ़ में गर्मी या विद्युत-सी अनुभूति
- ▸शरीर में स्वतः आसन या मुद्राएं
- ▸आनंद और प्रकाश का अनुभव
- ▸नाद (आंतरिक ध्वनि)
चेतावनी
बिना गुरु के असंतुलित कुंडलिनी जागरण = शारीरिक-मानसिक कष्ट। गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य।





