विस्तृत उत्तर
कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद के अनुसार जब जीव अपने मन के संकल्प मात्र से इस विजरा नदी को पार करता है तो वह अपने सम्पूर्ण शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप) कर्मों को सदा के लिए झटक देता है ठीक वैसे ही जैसे अश्व अपने शरीर से धूल झटकता है। उसके पाप उसके शत्रुओं को और उसके पुण्य उसके प्रियजनों को प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार वह पूर्णतः कर्म-बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्म के समक्ष उपस्थित होने का अधिकारी बन जाता है। विजरा नदी पार करने का यह अर्थ है कि जीव भौतिक कर्मों की सीमा से परे चला जाता है और वह शुद्ध चेतना की अवस्था में ब्रह्मा जी के सान्निध्य में प्रवेश करता है।
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