विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कंध के प्रथम और पंचम अध्याय में ब्रह्मांड की कल्पना भगवान विष्णु के विराट स्वरूप के रूप में की गई है। ब्रह्मा जी देवर्षि नारद को ब्रह्मांडीय संरचना का उपदेश देते हुए विराट स्वरूप का वर्णन करते हैं। श्रीमद्भागवत (2.5.40-41) के अनुसार — कट्यां चातलं कॢप्तम — भगवान के विराट स्वरूप की कटि (कमर) में अतल लोक स्थित है। उनकी जांघों में वितल लोक, घुटनों में सुतल लोक, पिंडलियों में तलातल लोक, टखनों में महातल लोक, पंजों में रसातल लोक और पैरों के तलवों में पाताल लोक स्थित है। यह प्रतीकात्मक वर्णन दर्शाता है कि ब्रह्मांड का कोई भी लोक भगवान के शरीर से पृथक नहीं है।
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