विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत (2.5.40-41) में भगवान के विराट स्वरूप में सातों पातालों के स्थान का विस्तृत वर्णन है। ब्रह्मा जी देवर्षि नारद को उपदेश देते हैं — कट्यां चातलं कॢप्तमूरुभ्यां वितलं विभोः। जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम्। महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम्। पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान्। इस श्लोक के अनुसार — भगवान की कटि (कमर) में अतल, जांघों में वितल, घुटनों में सुतल, पिंडलियों में तलातल, टखनों में महातल, पंजों में रसातल और पैरों के तलवों में पाताल लोक स्थित है। यह वर्णन दर्शाता है कि ब्रह्मांड का कोई भी लोक भगवान के शरीर से पृथक नहीं है और अतल लोक भी उसी परम ईश्वरीय संरचना का अभिन्न अंग है।
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