विस्तृत उत्तर
यह सृष्टि के सबसे रहस्यमय और गहन प्रश्नों में से एक है, जिसका उत्तर विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण और भारतकोश के अनेक संदर्भों में मिलता है।
पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि का आरंभ होने वाला था, तब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न था। उस समय केवल भगवान विष्णु ही शेषनाग की शैय्या पर क्षीरसागर में योगनिद्रा में विराजमान थे। उनके शरीर में संपूर्ण प्राणी सूक्ष्म रूप से विद्यमान थे। तब 'कालशक्ति' जागृत हुई और भगवान की सूक्ष्म इच्छाशक्ति से उनकी नाभि में से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल पर ब्रह्माजी स्वयंभू रूप में प्रकट हुए।
श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 3, अध्याय 8–9) में बताया गया है कि नाभिकमल की डंठल अत्यंत लंबी थी। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए, तो उनके मन में जिज्ञासा हुई कि वे कौन हैं और कहाँ से आए हैं। वे कमल डंठल से नीचे उतरते चले गए परंतु विष्णु को देख नहीं पाए। तब उन्होंने तपस्या की और आत्मज्ञान प्राप्त हुआ कि वे भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए हैं और उन्हें ही सृष्टि का निर्माण करना है।
इसी कारण ब्रह्माजी को 'पद्मयोनि', 'नाभिज' और 'नाभिकमलज' भी कहा जाता है — क्योंकि उनका प्राकट्य विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पर हुआ।
पुराणों में इसका आध्यात्मिक अर्थ भी है — विष्णु ब्रह्म-तत्व के पालक स्वरूप हैं और ब्रह्मा सृजन-शक्ति के प्रतीक हैं। नाभि शरीर का केंद्र है और इससे जीवन का आरंभ होता है। इसलिए सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का प्राकट्य ब्रह्मांड के पालक विष्णु की नाभि से दिखाया गया — यह एक गहन सांकेतिक सत्य है।
आज भी मंदिरों में विष्णु की प्रतिमा में नाभि से कमल-डंठल और उस पर ब्रह्मा की आकृति देखी जाती है।





