विस्तृत उत्तर
क्षीरसागर — जिसका शाब्दिक अर्थ है 'दूध का सागर' — हिंदू पुराणों में वर्णित एक दिव्य और अलौकिक सागर है जिसे भगवान विष्णु का निवास स्थान माना गया है। विष्णु पुराण, भागवत पुराण और अन्य पुराणों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
यह कोई सामान्य भौतिक सागर नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित एक दिव्य महासागर है जहाँ भगवान विष्णु अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी के साथ शेषनाग (अनंत नाग) की शैय्या पर विश्राम करते हैं। यह स्थान वह है जहाँ कालशक्ति जागृत रहती है और जहाँ से सृष्टि का संचालन होता है। भगवान विष्णु की नाभि से कमल-नाल निकलती है जिस पर ब्रह्माजी विराजमान होते हैं।
पुराणों में 'सप्त सागर' की अवधारणा है — सात महासागर जो अलग-अलग तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्षीरसागर इनमें से एक है। इसमें श्वेत प्रकाश की लहरें, दिव्य अमृत-तुल्य जल और अद्वितीय शांति है। इस सागर का कोई दुख, रोग या क्लेश नहीं है।
पुराणों के ही एक प्रसंग में देव-दानवों के 'समुद्र मंथन' का उल्लेख मिलता है। इस मंथन से अमृत, लक्ष्मी, धन्वंतरि, कामधेनु आदि चौदह रत्न निकले थे।
पार्थिव जगत में क्षीरसागर की पहचान को लेकर मतभेद है। एक मान्यता के अनुसार कैलाश पर्वत से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित मानसरोवर झील को प्रतीकात्मक रूप से क्षीरसागर कहा जाता है। किंतु पुराणों में वर्णित क्षीरसागर एक दिव्य लोक में स्थित है जो केवल ध्यानावस्था और योगसिद्धि में अनुभव किया जा सकता है।
भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से चार माह योगनिद्रा में क्षीरसागर में विश्राम करते हैं — इसे 'चातुर्मास' कहते हैं।





