विस्तृत उत्तर
क्षीरसागर और भगवान विष्णु की इस कथा में महाप्रलय के बाद का पूर्ण शून्य वर्णित है, जहाँ स्थूल जगत लीन हो चुका है और केवल कारण-जल, अनंत शेष और योगनिद्रा में स्थित विष्णु शेष हैं। फिर भगवान विष्णु के भीतर सृजन-संकल्प जागता है, जिससे पहला स्पंदन और आदिनाद प्रकट होता है। उनकी प्रथम श्वास से कालचक्र चल पड़ता है और सृष्टि में समय, दिशा, प्रकाश, पंचभूत और ब्रह्मांडीय गति जन्म लेते हैं। आगे विष्णु की नाभि से कमल प्रकट होता है, ब्रह्मा जी जन्म लेते हैं और वराह अवतार पृथ्वी को जल से ऊपर उठाकर सृष्टि को स्थिर आधार देता है।
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