विस्तृत उत्तर
श्रीमद्देवी भागवत पुराण के तीसरे स्कंध में स्पष्ट किया गया है कि सृष्टि के आरंभ में जब कुछ भी नहीं था, तब केवल निर्गुण, निराकार और निरंजन परब्रह्म का ही अस्तित्व था।
उस परब्रह्म ने जब सृष्टि की रचना करने की इच्छा (संकल्प) की, तब उसने स्वयं को दो भागों में विभक्त कर लिया — बायाँ भाग स्त्री (प्रकृति/शक्ति) बन गया और दायाँ भाग पुरुष (ब्रह्म/काल/शिव) बन गया।
जो साधक इस संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकृति का ही विस्तार समझता है और पुरुष को निर्लेप देखता है, वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।





