विस्तृत उत्तर
देवी भागवत पुराण में भगवान के विराट स्वरूप की अवधारणा को देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। इसमें इस लोक को देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप की नाभि के रूप में वर्णित किया गया है। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध में जो विराट पुरुष का वर्णन है उसी के समानांतर देवी भागवत में देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप का वर्णन है जिसमें भुवर्लोक को नाभि-स्थान पर बताया गया है। यह नाभि-स्थान प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाता है कि भुवर्लोक ब्रह्मांड की केंद्रीय प्राण-शक्ति का संचालन केंद्र है। जिस प्रकार मानव शरीर में नाभि प्राण ऊर्जा का उद्गम है उसी प्रकार देवी के विराट स्वरूप में भुवर्लोक ब्रह्मांडीय प्राण-ऊर्जा का केंद्र है।
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