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पात्रता और शुद्धि⏱ 1 मिनट पठन

कलश स्थापना से पहले शरीर और मन की शुद्धि कैसे करें?

देवी भागवत: बाह्य शुद्धि (स्नान) + आभ्यंतर शुद्धि (मानसिक पवित्रता) अनिवार्य।

संक्षिप्त उत्तर

देवी भागवत: बाह्य शुद्धि (स्नान) + आभ्यंतर शुद्धि (मानसिक पवित्रता) अनिवार्य। आचमन: 'ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा' — तीन बार जल ग्रहण (त्रिविध ताप शांति)। इसके बाद प्राणायाम से मन एकाग्र करें।

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विस्तृत उत्तर

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार, महादेवी की उपासना और कलश स्थापना से पूर्व साधक के लिए 'बाह्य शुद्धि' (स्नानादि से शरीर की पवित्रता) और 'आभ्यंतर शुद्धि' (मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता) सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

अनुष्ठान का वास्तविक आरंभ वाक्-संयम (मौन या केवल ईश्वरीय नाम का उच्चारण) और 'आचमन' से होता है। साधक दाहिने हाथ की हथेली में जल लेकर 'ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा' मंत्रों का उच्चारण करते हुए तीन बार जल ग्रहण करता है, जिससे त्रिविध तापों की शांति होती है और आभ्यंतर शुद्धि सिद्ध होती है।

आचमन के पश्चात् 'प्राणायाम' के माध्यम से श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है, जो मन को अनुष्ठान के लिए एकाग्र करता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

कलश स्थापना से पहले शरीर और मन की शुद्धि कैसे करें को संदर्भ सहित समझें

कलश स्थापना से पहले शरीर और मन की शुद्धि कैसे करें का सबसे सीधा सार यह है: देवी भागवत: बाह्य शुद्धि (स्नान) + आभ्यंतर शुद्धि (मानसिक पवित्रता) अनिवार्य। आचमन: 'ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा' — तीन बार जल ग्रहण (त्रिविध ताप...

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