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प्रकृति-पुरुष सिद्धांत⏱ 1 मिनट पठन

शाक्त दर्शन में प्रकृति और पुरुष का क्या संबंध है?

प्रकृति-पुरुष = अभिन्न अविभाज्य (जैसे अग्नि-ताप, कमल-सुगंध, सूर्य-रश्मि)। दुर्गा = प्रकृति — जगत को जन्म, पालन, संहार करती हैं।

संक्षिप्त उत्तर

प्रकृति-पुरुष = अभिन्न अविभाज्य (जैसे अग्नि-ताप, कमल-सुगंध, सूर्य-रश्मि)। दुर्गा = प्रकृति — जगत को जन्म, पालन, संहार करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव देवी के त्रिगुणों के अधीन। पुरुष = केवल साक्षी और निर्लेप। सृष्टि की समस्त क्रियाएं = प्रकृति (दुर्गा) द्वारा।

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विस्तृत उत्तर

देवी भागवत पुराण कहता है कि 'प्रकृति' और 'पुरुष' में 'अभेद संबंध' है। वे एक दूसरे से उसी प्रकार अभिन्न और अविभाज्य हैं जैसे अग्नि और उसका ताप, कमल और उसकी सुगंध, या सूर्य और उसकी रश्मियाँ।

दुर्गा ही वह 'प्रकृति' हैं जो इस संपूर्ण जगत को जन्म देती हैं, इसका पालन करती हैं, और प्रलयकाल में इसका संहार करती हैं। पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा (रजोगुण), विष्णु (सत्त्वगुण) और शिव (तमोगुण) देवी दुर्गा के ही त्रिगुणों के अधीन कार्य करते हैं और वे प्रकृति के ही विकार हैं।

भगवद्गीता (१३.२०) का संदर्भ देते हुए शाक्त दर्शन यह स्पष्ट करता है कि पुरुष (परमात्मा) केवल साक्षी, क्षेत्रज्ञ और निर्लेप है। सृष्टि के निर्माण और विनाश की सभी क्रियाएँ केवल 'प्रकृति' (दुर्गा) द्वारा ही संपन्न होती हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

शाक्त दर्शन में प्रकृति और पुरुष का क्या संबंध है को संदर्भ सहित समझें

शाक्त दर्शन में प्रकृति और पुरुष का क्या संबंध है का सबसे सीधा सार यह है: प्रकृति-पुरुष = अभिन्न अविभाज्य (जैसे अग्नि-ताप, कमल-सुगंध, सूर्य-रश्मि)। दुर्गा = प्रकृति — जगत को जन्म, पालन, संहार करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव देवी के त्रिगुणों के अधीन। पुरुष...

प्रकृति-पुरुष सिद्धांत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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प्रकृति-पुरुष सिद्धांत प्रश्नोत्तर
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