विस्तृत उत्तर
देवी भागवत पुराण कहता है कि 'प्रकृति' और 'पुरुष' में 'अभेद संबंध' है। वे एक दूसरे से उसी प्रकार अभिन्न और अविभाज्य हैं जैसे अग्नि और उसका ताप, कमल और उसकी सुगंध, या सूर्य और उसकी रश्मियाँ।
दुर्गा ही वह 'प्रकृति' हैं जो इस संपूर्ण जगत को जन्म देती हैं, इसका पालन करती हैं, और प्रलयकाल में इसका संहार करती हैं। पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा (रजोगुण), विष्णु (सत्त्वगुण) और शिव (तमोगुण) देवी दुर्गा के ही त्रिगुणों के अधीन कार्य करते हैं और वे प्रकृति के ही विकार हैं।
भगवद्गीता (१३.२०) का संदर्भ देते हुए शाक्त दर्शन यह स्पष्ट करता है कि पुरुष (परमात्मा) केवल साक्षी, क्षेत्रज्ञ और निर्लेप है। सृष्टि के निर्माण और विनाश की सभी क्रियाएँ केवल 'प्रकृति' (दुर्गा) द्वारा ही संपन्न होती हैं।





