विस्तृत उत्तर
वाक् सूक्त के ८ श्लोकों में वाक् (सरस्वती) स्वयं को ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति, शासिका और संचालक के रूप में घोषित करती हैं:
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुतविश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नीहमश्विनोभा।।
भावार्थ: 'मैं ही एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं, आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में विचरण करती हूँ। मैं ही मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि और दोनों अश्विनी कुमारों को धारण करती हूँ।'
वाक् आगे घोषणा करती हैं:
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमायज्ञियानाम।
भावार्थ: 'मैं राष्ट्र की अधिष्ठात्री, धन-संपदा प्रदान करने वाली, परब्रह्म को जानने वाली और यज्ञों में प्रथम पूज्या हूँ। देवताओं ने मेरे इस बहुआयामी रूप को पहचाना है और वे मुझमें प्रवेश कर मुझे धारण करते हैं।'
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईंशृणोत्युक्तम।
भावार्थ: 'यह मेरी ही शक्ति है जिससे कोई प्राणी अन्न खाता है, देखता है, श्वास लेता है और कही गई बात को सुनता है।'





