विस्तृत उत्तर
विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व के 149वें अध्याय में संकलित है। इसे भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को कुरुक्षेत्र में बाणों की शय्या पर लेटे हुए उपदेश दिया था। इसमें भगवान विष्णु के 1000 दिव्य नाम हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशेष शक्ति और गुण का प्रतिनिधित्व करता है।
इन 1000 नामों में से कुछ विशेष रूप से शक्तिशाली और प्रसिद्ध नाम हैं — 'विष्णु' (सर्वत्र व्यापक, जगत के पालनकर्ता), 'नारायण' (नरों के आश्रय, समस्त जीवों का अंतिम आश्रय), 'जनार्दन' (लोगों की रक्षा करने वाले), 'गोविंद' (गायों के स्वामी, वेदों के ज्ञाता), 'माधव' (मा अर्थात लक्ष्मी के पति), 'पुरुषोत्तम' (सर्वश्रेष्ठ पुरुष), 'अच्युत' (जो कभी पतित नहीं होते), 'वासुदेव' (सबमें वास करने वाले), 'हृषीकेश' (इंद्रियों के स्वामी), 'श्रीधर' (लक्ष्मी को धारण करने वाले), 'पद्मनाभ' (कमलनाभ), 'विश्वरूप' (विश्व ही जिनका स्वरूप है) और 'अनंत' (अनंत शक्ति वाले)।
विष्णु सहस्रनाम के फल श्लोक में कहा गया है — 'विष्णोर्नाम सहस्रं मे शृणु पापभयापहम्' — जो इन नामों को सुनता या पढ़ता है, उसके पाप और भय का नाश होता है। इसका पाठ बुधवार और शनिवार को विशेष रूप से फलदायक माना जाता है।





